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सर्वकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 192 में से

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पृष्ठ 55

, अपभ्रंशप्रयोगाभावाय अपे-"
Wait, "स्वीक्रियते":
"स्वी क्रि य ते" -> "स्वीक्रियते".
Line 25:
"क्ष्यते इति यावत् ॥ १४ ॥"

Line 26 (Hindi):
"और वही व्याकरण अपवर्गका (मोक्षका) उपाय है, पापको उत्पन्न करने वाले अपशब्दरूपी"
Line 27:
"वाणीके मलोंकी चिकित्सा (औषध) करने वाला है, सब विद्याओंमें पवित्र और साधुशब्दोंकी"
Line 28:
"द्योतनिके कारण सब विद्याओंसे आदृत भी है ॥ १४ ॥"
Wait, "द्योतनिके":
Let's check: "द्योतनिके" or "द्योतनेके"?
It has an 'ि' matra on 'न': "द्योतनिके".

Line 29:
"ननु 'श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः' इति स्मरणाच्छ्रुतिवाक्यश्र-"
Line 30:
"वणजन्यमेव शब्दब्रह्मज्ञानमपवर्गायलं१ न व्याकरणजन्यम्, न च शब्दशक्तिग्रहाय"
(Note: '१' is the footnote callout).

Footnote divider.
Line 31:
"१. इदं च मतं 'वेदान्तमुद्दिश्याप्रवृत्तानामपीषदप्रवृत्ता