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वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 192 में से

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पृष्ठ 18

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ने ही अपने पूर्ववर्ती टीकाकारों का अनेक स्थानों पर उल्लेख किया है। इनके भी समय का
ठीक परिज्ञान नहीं हो सका है फिर भी इन्होंने जो कुछ अपने विषय में लिखा है उसीसे
पर्याप्त प्रकाश मिलता है ।
हेलाराज ने तृतीय काण्ड के अन्त में लिखा है कि—
मुक्तापीड इति प्रसिद्धिमगमत्काश्मीरदेशे नृपः
श्रीमान् ख्यातयशा बभूव नृपतेस्तस्य प्रभावानुगः ।
मन्त्री लक्ष्मण इत्युदारचरितस्तस्यान्ववाये भवो
हेलाराज इमं प्रकाशमकरोच्छ्रीभूतिराजात्मजः ॥
इससे पता चलता है कि काश्मीर देश के राजा मुक्तापीड के प्रधान मन्त्री लक्ष्मण के
वंश में भूतिराज के पुत्र के रूप में हेलाराज ने जन्म लिया था । इससे लक्ष्मण के कितनी
पीढ़ी के बाद हेलाराज ने जन्म लिया यह सन्दिग्ध ही रह जाता है। फिर भी बूह्लर
महोदय ( जो अनेक प्राचीन पुस्तकों की खोज ही किया करते थे ) ने अभिनव गुप्त
रचित गीताभाष्य पुस्तक प्राप्त की, जिसमें अभिनव गुप्त ने भूतिराज के पुत्र भट्टेन्दूराज को
अपना गुरु स्वीकार किया है । भूतिराज के पुत्र होने के कारण यह स्वीकार करना पड़ता है
कि भट्टेन्दूराज और हेलाराज सोदर भाई थे । अभिनव गुप्त के काल के आधार पर हेलाराज
का काल ख्रीस्तीय दशम शतक का उत्तरार्ध स्वीकार किया जा सकता है ।
राजतरंगिणीकार महाकवि कल्हण ने हेलाराज की एक श्लोक में चर्चा की है—
बद्धा द्वादशभिर्ग्रन्थसहस्रैः पार्थिवावलिः । प्राक्छातमतिना येन हेलाराजद्विजन्मना ॥
डा० त्रोय ने कल्हण का समय ई० की ११वीं शताब्दी स्वीकार किया है इससे भी स्पष्ट
है कि हेलाराज उनसे पूर्ववर्ती रहे हैं ।
हेलाराज ने सम्पूर्ण वाक्यपदीय पर टीका रची है । इन्होंने स्वयं लिखा है कि 'काण्डद्वये
यथावृत्ति सिद्धान्तार्थसतत्त्वतः' । प्रथम काण्ड की टीका का नाम इन्होंने 'शब्दप्रभा' रक्खा
था जैसा कि इन्होंने लिखा है कि 'विस्तरेणागमप्रामाण्ये वाक्यपदीयेऽस्माभिः प्रथम-
काण्डे शब्दप्रभायां निर्णीतम् ।'
हेलाराज ने वाक्यपदीय टीका रचने के पूर्व 'क्रियाविवेक' और 'वार्तिकोन्मेष' नाम के
दो ग्रन्थों का भी निर्माण कर लिया था । जैसा कि उन्होंने तृतीय काण्ड की कई कारिकाओं
की व्याख्या में निर्देश किया है ।
१. तृतीय काण्ड जाति समुद्देश ५० कारिका की व्याख्या में लिखा है कि 'क्रियाविवेके
विस्तरेणास्माभिरभिहितमिति तत एवावधार्यताम् ।'
२. क्रियासमुद्देश की १ कारिका की टीका के अन्त में 'फलतस्तु सामर्थ्याद्भवति क्रिया-
विवेके क्रियैव प्रधानभूता वाक्यार्थ इति निर्णीतं तत एवावधार्यम् ।'
इन अंशों तथा इसी प्रकार अनेक स्थानों पर अपनी कृति का क्रियाविवेक के नाम से
स्मरण किया है ।
३. वार्त्तिकोन्मेष की चर्चा तो लिङ्गसमुद्देश के अन्त में 'सिद्धान्तस्तु यथाभाष्यं गुणा-
वस्थारूपं लिङ्गमित्यस्माभिः वार्त्तिकोन्मेषे यथागमं व्याख्यातं तत एवावधार्यम् ।'
४. द्रव्यसमुद्देश की १५वीं कारिका की टीका में इन्होंने अपने 'अद्वयसिद्धि' नाम के
ग्रन्थ की सूचना दी है। जैसे—'कारणान्तरव्युदासश्चाद्वयसिद्धावभिहित इति सत्यर्थित्वे
सत एवावगन्तव्यः ।'
२ वा० भू०