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वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 192 में से

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पृष्ठ 15

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वाक्यपदीय
आचार्य भर्तृहरि रचित अनेक ग्रन्थों का नाम पीछे बतलाया जा चुका है। हम इस प्रकरण
में उनके समस्त ग्रन्थों का न तो परिचय देंगे न उन पर कुछ विचार ही करेंगे किन्तु
प्रस्तुत ग्रन्थ वाक्यपदीय के विषय में कुछ परिचयात्मक विचार व्यक्त करने चल रहे हैं।
वाक्यपदीय नाम
आचार्य भर्तृहरि ने इस ग्रंथ का नाम वाक्यपदीय रखा जिसका अर्थ है कि वाक्य और
पद के विषय में विचार के लिए आरब्ध ग्रन्थ (वाक्यं च पदं च वाक्यपदे ते अधिकृत्य
कृतो ग्रन्थो वाक्यपदीयम्) । इस वाक्यपदीय में तीन काण्ड हैं इसीलिए इसे त्रिकाण्डी
भी कहा गया है ।
महामहोपाध्याय पण्डित श्री गङ्गाधर शास्त्री मानवर्ली ने काशी संस्करण की भूमिका में
लिखा है कि 'वाक्य और पद विचारक ग्रन्थ होने के कारण दो काण्ड की ही 'वाक्यपदीय' संज्ञा
है, यह बात द्वितीय काण्ड के अन्तिम श्लोकों से ही व्यक्त हो जाती है जो ग्रन्थ-समाप्ति में
लिखे गये हैं। तृतीय काण्ड तो कारक आदि विचार परक है अतः आरम्भ के दो काण्डों
को ही 'वाक्यपदीय' स्वीकार करना चाहिए।' इधर जो वाक्यपदीय पर स्वोपज्ञ टीका प्राप्त
हुई है वह भी दो काण्डों पर ही है, यह भी सिद्ध करता है कि आचार्य भर्तृहरि ने प्रथम और
द्वितीय काण्ड को ही 'वाक्यपदीय' के रूप में स्वीकार किया हो। द्वितीय काण्ड की—
दर्शनमात्रम केषाञ्चित् परमुमात्रमुदाहृतम् ।
काण्डे तृतीये न्यायेन भविष्यति विचारणा ॥ २।४८४ ॥
कारिका में आचार्य भर्तृहरि ने स्वयं तृतीय काण्ड रचने की प्रतिज्ञा भी की है। इससे तृतीय
काण्ड के भर्तृहरि रचित होने में कोई विवाद नहीं है। हाँ, यह अवश्य है कि वाक्यपदीय पूर्ण
है किन्तु तृतीय काण्ड में उन्हीं सिद्धान्तों पर विशद विचार है। अतः यह कहना कि
'वाक्यपदीय' दो काण्डों में पूर्ण नहीं है असंगत है। तृतीय काण्ड के बिना दो काण्ड अधूरे हैं
यह कहना संगत हो सकता है। इसीलिए प्राचीन विद्वानों ने (स्वयं हेलाराज तथा वाक्यपदीयकार
ने) तृतीय काण्ड को 'वाक्यपदीय' का पूरक माना है और इसीलिए उसे प्रकीर्ण काण्ड भी कहा
जाता है। अतः हम श्री चारुदत्त शास्त्री के इस कथन से सहमत नहीं हैं कि 'तृतीय काण्ड
वाक्यपदीय का मुख्य अंग है, प्रकीर्ण नहीं।'
वाक्यपदीय कारिकायें
वाक्यपदीय की प्रत्येक कारिका भाष्य के किसी न किसी वाक्य को आधार मानकर रची
गई है। जैसे भाष्य के त्रिपादी में 'यथाऽम्वाम्बेति शिक्षमाणो बालोऽन्यथोच्चारयति'
इसको आधार मानकर—
अम्बाम्बेति यथा बालः शिक्षमाणो प्रभाषते ।
अव्यक्तं तद्विदां तेन व्यक्ते भवति निश्चयः ॥ इत्यादि ॥
इस पर विशेष रूप से अनुसन्धान अपेक्षित है कि भाष्य के किन सिद्धान्तों के आधार पर
किस कारिका का निर्माण हुआ है।

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