वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)
Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary
भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा
पृष्ठ 647, कुल 835 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्रपाठः । ( ४१ )
रात्मनः ॥ १४१ ॥ ति विंशतेर्डिति ॥ १४२ ॥ टेः ॥ १४३ ॥ नस्तद्धिते ॥ १४४ ॥
अह्नष्टखोरेव ॥ १४५ ॥ ओर्गुणः ॥ १४६ ॥ ढे लोपोऽकद्र्वाः ॥ १४७ ॥ यस्येति च ॥
॥ १४८ ॥ सूर्यतिष्यागस्त्यमत्स्यानां य उपधायाः ॥ १४९ ॥ हलस्तद्धितस्य ॥ १५० ॥
आपत्यस्य च तद्धितेऽनाति ॥ १५१ ॥ क्यच्च्योश्च ॥ १५२ ॥ बिल्वकादिभ्यश्छस्य लुक् ॥
॥ १५३ ॥ तुरिष्ठेमेयःसु ॥ १५४ ॥ टेः ॥ १५५ ॥ स्थूलदूरयुवह्रस्वक्षिप्रक्षुद्राणां यणादिपरं
पूर्वस्य च गुणः ॥ १५६ ॥ प्रियस्थिरस्फिरोरुबहुलगुरुवृद्धतृप्रदीर्घवृन्दारकाणां प्रस्थस्फवर्वहि-
गर्वर्षित्रब्दाघिवृन्दाः ॥ १५७ ॥ बहोर्लोपो भू च बहोः ॥ १५८ ॥ इष्ठस्य यिट् च ॥ १५९॥
ज्यादादीयसः ॥ १६० ॥ ८ ॥ र ऋतो हलादेर्लघोः ॥ १६१ विभाषार्जोश्छन्दसि ॥ १६२॥
प्रकृत्यैकाच् ॥ १६३ ॥ इनण्यनपत्ये ॥ १६४ ॥ गाथिविदथिकेशिगणिपणिनश्च ॥ १६५ ॥
संयोगादिश्च ॥ १६६ ॥ अन् ॥ १६७ ॥ ये चाभावकर्मणोः ॥ १६८ ॥ आत्माध्वानौ खे ॥
॥ १६९ ॥ न मपूर्वोऽपत्येऽवर्मणः ॥ १७० ॥ ब्राह्मोऽजातौ ॥ १७१ ॥ कार्महन्ताच्छील्ये ॥
॥ १७२ ॥ औक्षमनपत्ये ॥ १७३ ॥ दाण्डिनायनहास्तिनायनाथर्वणिकजैह्माशिनेयवासिना-
यनिभ्रौणहत्यधैवत्यसारवैक्षकैमात्रेयहिरण्मयानि ॥ १७४ ॥ ऋत्यव्यास्र्त्तव्यवस्तव्ध्वीहिरण्ययानि
च्छन्दसि ॥ १७५ ॥ १९ ॥ ( अङ्गस्य राह्लोपो विड्वनोर्वाक्रोशेणो यण्डुझल्भ्यस्थलि च
मन्त्रेषु र ऋतः पञ्चदश ) ॥
इति षष्ठाध्यायस्य तुरीयः पादः ॥
॥ इति षष्ठाध्यायस्समाप्तः ॥
अथ सप्तमोऽध्यायः ॥
युवोरनाक्कौ ॥ १ ॥ आयनेयीनीयियःफढखच्छघां प्रत्ययादीनाम् ॥ २ ॥ झोऽन्तः ॥ ३ ॥
अदभ्यस्तात् ॥ ४ ॥ आत्मनेपदेष्वनतः ॥ ५ ॥ शीङो रुट् ॥ ६ ॥ वेत्तेर्विभाषा ॥ ७ ॥
बहुलं छन्दसि ॥ ८ ॥ अतो भिस ऐस् ॥ ९ ॥ बहुलं छन्दसि ॥ १० ॥ नेदमदसोरकोः ॥
॥ ११ ॥ टाङसिङसामिनात्स्याः ॥ १२ ॥ ङेर्यः ॥ १३ ॥ सर्वनाम्नः स्मै ॥ १४ ॥
ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ ॥ १५ ॥ पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा ॥ १६ ॥ जसः शी ॥ १७ ॥
औङ आपः ॥ १८ ॥ नपुंसकाच्च ॥ १९ ॥ जश्शसोः शिः ॥ २० ॥ १ ॥ अष्टाभ्य
औश् ॥ २१ ॥ षड्भ्यो लुक् ॥ २२ ॥ स्वमोर्नपुंसकात् ॥ २३ ॥ अतोऽम् ॥ २४ ॥
अड्डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः ॥ २५ ॥ नेतराच्छन्दसि ॥ २६ ॥ युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् ॥ २७ ॥
ङेप्रथमयोरम् ॥ २८ ॥ शसो न ॥ २९ ॥ भ्यसोऽभ्यम् ॥ ३० ॥ पञ्चम्या अत् ॥ ३१ ॥
एकवचनस्य च ॥ ३२ ॥ साम आकम् ॥ ३३ ॥ आत औ णलः ॥ ३४ ॥ तुह्योस्तातङ्-
ङाशिष्यन्यतरस्याम् ॥ ३५ ॥ विदेः शतुर्वसुः ॥ ३६ ॥ समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप् ॥
॥ ३७ ॥ क्त्वापि च्छन्दसि ॥ ३८ ॥ सुपां सुलुकपूर्वसवर्णाच्छेयाडाडड्यायाजालः ॥ ३९॥ अमो
मश् ॥ ४० ॥ २ ॥ लोपस्त आत्मनेपदेषु ॥ ४१ ॥ ध्वमो ध्वात् ॥ ४२ ॥ यजध्वैनमिति