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सर्वकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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पृष्ठ 615

न दधिपयआदीनि ॥ १४ ॥ अधिकरणैतावत्त्वे च ॥ १५ ॥ विभाषा समीपे ॥ १६ ॥ स
नपुंसकम् ॥ १७ ॥ अव्ययीभावश्च ॥ १८ ॥ तत्पुरुषोऽनञ्कर्मधारयः ॥ १९ ॥ संज्ञायां
कन्थोशीनरेषु ॥ २० ॥ १ ॥ उपज्ञोपक्रमं तदाद्याचिख्यासायाम् ॥ २१ ॥ छाया बाहुल्ये ॥
॥ २२ ॥ सभा राजाऽमनुष्यपूर्वा ॥ २३ ॥ अशाला च ॥ २४ ॥ विभाषा सेनासुराच्छायाशा-
लानिशानाम् ॥ २५ ॥ परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः ॥ २६ ॥ पूर्ववदश्ववडवौ ॥ २७ ॥
हेमन्तशिशिरावहोरात्रे च च्छन्दसि ॥ २८ ॥ रात्राह्नाहाः पुंसि ॥ २९ ॥ अपथं नपुंसकम् ॥
॥ ३० ॥ अर्धर्चाः पुंसि च ॥ ३१ ॥ इदमोऽन्वादेशेऽशनुदात्तस्तृतीयादौ ॥ ३२ ॥ एतदस्त्र-
तसोरेतसौचानुदात्तौ ॥ ३३ ॥ द्वितीयाटौस्स्वेनः ॥ ३४ ॥ आर्धधातुके ॥ ३५ ॥ अदो
जग्धिर्ल्यति किति ॥ ३६ ॥ लुङ्सनोर्वध्लृ ॥ ३७ ॥ वञपोश्च ॥ ३८ ॥ बहुलं छन्दसि ॥ ३९ ॥
लित्यन्यतरस्याम् ॥ ४० ॥ २ ॥ वेञो वयिः ॥ ४१ ॥ हनो वध लिङि ॥ ४२ ॥ लुङि च ॥ ४३ ॥
आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम् ॥ ४४ ॥ इणो गा लुङि ॥ ४५ ॥ णौ गमिरबोधने ॥ ४६ ॥
सनि च ॥ ४७ ॥ इङश्च ॥ ४८ ॥ गाङ् लिटि ॥ ४९ ॥ विभाषा लुङ्लृङोः ॥ ५० ॥
णौ च संश्वडोः ॥ ५१ ॥ अस्तेर्भूः ॥ ५२ ॥ ब्रुवो वचिः ॥ ५३ ॥ चक्षिङः ख्याञ् ॥ ५४ ॥
वा लिटि ॥ ५५ ॥ अजेर्व्यघञपोः ॥ ५६ ॥ वा यौ ॥ ५७ ॥ ण्यक्षत्रियार्षञितो यूनि
लुगणिञोः ॥ ५८ ॥ पैलादिभ्यश्च ॥ ५९ ॥ इञः प्राचाम् ॥ ६० ॥ ३ ॥ न तौल्वलिभ्यः ॥ ६१ ॥
तद्राजस्य बहुषु तेनैवाऽस्त्रियाम् ॥ ६२ ॥ यस्कादिभ्यो गोत्रे ॥ ६३ ॥ यञञोश्च ॥ ६४ ॥
अत्रिभृगुकुत्सवसिष्ठगोतमाङ्गिरोभ्यश्च ॥ ६५ ॥ बह्वच इञः प्राच्यभरतेषु ॥ ६६ ॥ न गोपवना-
दिभ्यः ॥ ६७ ॥ तिककितवादिभ्यो द्वन्द्वे ॥ ६८ ॥ उपकादिभ्योऽन्यतरस्यामद्वन्द्वे ॥ ६९ ॥
आगस्त्यकौण्डिन्ययोरगस्तिकुण्डिनच् ॥ ७० ॥ सुपो धातुप्रातिपदिकयोः ॥ ७१ ॥ अदिप्रभृ-
तिभ्यः शपः ॥ ७२ ॥ बहुलं छन्दसि ॥ ७३ ॥ यडोऽचि च ॥ ७४ ॥ जुहोत्यादिभ्यः
श्लुः ॥ ७५ ॥ बहुलं छन्दसि ॥ ७६ ॥ गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु ॥ ७७ ॥
विभाषा घ्राधेट्शाच्छासः ॥ ७८ ॥ तनादिभ्यस्तथासोः ॥ ७९ ॥ मन्त्रे घसह्वरणश्ववृदहाद्द्वृच्-
कॄगमिजनिभ्यो लेः ॥ ८० ॥ ४ ॥ आमः ॥ ८१ ॥ अव्ययादाप्सुपः ॥ ८२ ॥ नाव्ययी-
भावादतोऽम् त्वपञ्चम्याः ॥ ८३ ॥ तृतीयासप्तम्योर्बहुळम् ॥ ८४ ॥ लुटः प्रथमस्य डारौ-
रसः ॥ ८५ ॥ ५ ॥ ( द्विगुरुपज्ञोपक्रमं वेञोव यिनं तौल्वलिभ्य आमः पञ्च ) ॥ इति द्वितीय-
ध्यायस्य तुरीयः पादः ॥ ४ ॥
इति द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
अथ तृतीयोऽध्यायः ।
प्रत्ययः ॥ १ ॥ परश्च ॥ २ ॥ आद्युदात्तश्च ॥ ३ ॥ अनुदात्तौ सुप्पितौ ॥ ४ ॥ गुप्तिज्-
किद्भ्यः सन् ॥ ५ ॥ मान्बधदान्शान्भ्यो दीर्घश्चाभ्यासस्य ॥ ६ ॥ धातोः कर्मणः समान-
कर्तृकादिच्छायां वा ॥ ७ ॥ सुप आत्मनः क्यच् ॥ ८ ॥ काम्यच्च ॥ ९ ॥ उपमानादा-
चारे ॥ १० ॥ कर्तुः क्यङ् सलोपश्च ॥ ११ ॥ भृशादिभ्यो भुव्यच्वेर्लोपश्च हलः ॥ १२ ॥