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सर्वकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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पृष्ठ 613

भयेन ॥ ३७ ॥ अपेतापोढमुक्तपतितापत्रस्तैरल्पशः ॥ ३८ ॥ स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि
क्तेन ॥ ३९ ॥ सप्तमी शौण्डैः ॥ ४० ॥ २ ॥ सिद्धशुष्कपक्वबन्धैश्च ॥ ४१ ॥ ध्वाङ्क्षेण
क्षेपे ॥ ४२ ॥ कृत्यैर्ऋणे ॥४३॥ संज्ञायाम् ॥४४॥ क्तेनाहोरात्रावयवाः ॥४५॥ तत्र ॥ ४६ ॥
क्षेपे ॥ ४७ ॥ पात्रेसमितादयश्च ॥ ४८ ॥ पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधि-
करणेन ॥ ४९ ॥ दिक्संख्ये संज्ञायाम् ॥ ५० ॥ तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च ॥ ५१ ॥
संख्यापूर्वो द्विगुः ॥ ५२ ॥ कुत्सितानि कुत्सनैः ॥ ५३ ॥ पापाणके कुत्सितैः ॥ ५४ ॥
उपमानानि सामान्यवचनैः ॥ ५५ ॥ उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे ॥ ५६ ॥ विशेषणं
विशेष्येण बहुलम् ॥ ५७ ॥ पूर्वापरप्रथमचरमजघन्यसमानमध्यमध्यमवीराश्च ॥ ५८ ॥ श्रेण्या-
दयः कृतादिभिः ॥ ५९ ॥ क्तेन नञ्विशिष्टेनानञ् ॥६०॥ ३ ॥ सन्महत्परमोत्तमोत्कृष्टाः पूज्य-
मानैः ॥ ६१ ॥ वृन्दारकनागकुञ्जरैः पूज्यमानम् ॥ ६२ ॥ कतरकतमौ जातिपरिपश्ने ॥ ६३ ॥
किं क्षेपे ॥ ६४ ॥ पोटाद्युवतिस्तोककतिपयगृष्टिधेनुवशावेहद्वष्कयणीप्रवक्तृश्रोत्रियाध्यापकधूतै-
र्जातिः ॥ ६५ ॥ प्रशंसावचनैश्च ॥ ६६ ॥ युवा खलतिपलितवलिनजरतीभिः ॥ ६७ ॥
कृत्यतुल्याख्या अजात्या ॥ ६८ ॥ वर्णे वर्णेन ॥ ६९ ॥ कुमारः श्रमणादिभिः ॥ ७० ॥
चतुष्पादो गर्भिण्या ॥ ७१ ॥ मयूरव्यंसकादयश्च ॥ ७२ ॥ १२ ॥ (समर्थोऽन्यपदार्थे-
सिद्धशुष्कसन्महद्वादश) ॥
इति द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १ ॥
पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे ॥ १ ॥ अर्धं नपुंसकम् ॥ २ ॥ द्वितीयतृतीयच-
तुर्थतुर्याण्यन्यतरस्याम् ॥ ३ ॥ प्राप्तापन्ने च द्वितीयया ॥ ४ ॥ कालाः परिमाणिना ॥ ५ ॥
नञ् ॥ ६ ॥ ईषदकृता ॥ ७ ॥ षष्ठी ॥ ८ ॥ याजकादिभिश्च ॥ ९ ॥ न निर्धारणे ॥ १० ॥
पूरणगुणसुहितार्थसद्व्ययतव्यसमानाधिकरणेन ॥ ११ ॥ क्तेन च पूजायाम् ॥ १२ ॥ अधिक-
रणवाचिना च ॥ १३ ॥ कर्मणि च ॥ १४ ॥ तृजकाभ्यां कर्तरि ॥ १५ ॥ कर्तरि च ॥
॥ १६ ॥ नित्यं क्रीडाजीविकयोः ॥ १७ ॥ कुगतिप्रादयः ॥ १८ ॥ उपपदमतिङ् ॥ १९ ॥
अमैवाव्ययेन ॥ २० ॥ १ ॥ तृतीयाप्रभृतीन्यन्यतरस्याम् ॥ २१॥ क्त्वा च ॥ २२ ॥ शेषो
बहुव्रीहिः ॥ २३ ॥ अनेकमन्यपदार्थे ॥ २४ ॥ संख्ययाऽव्ययासन्नादूराधिकसंख्याः संख्येये ॥
॥ २५ ॥ दिङ्नामान्यन्तराले ॥ २६ ॥ तत्र तेनेदमिति सरूपे ॥ २७ ॥ तेन सहेति तुल्य-
योगे ॥ २८ ॥ चार्थे द्वन्द्वः ॥ २९ ॥ उपसर्जनं पूर्वम् ॥ ३० ॥ राजदन्तादिषु परम् ॥ ३१॥
द्वन्द्वे घि ॥ ३२ ॥ अजाद्यदन्तम् ॥ ३३ ॥ अल्पाच्तरम् ॥ ३४ ॥ सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहौ ॥
॥ ३५ ॥ निष्ठा ॥ ३६ ॥ वाहिताग्न्यादिषु ॥ ३७ ॥ कडाराः कर्मधारये ॥ ३८ ॥ १८ ॥
(पूर्वापराधरोत्तरं तृतीयाप्रभृतीन्यष्टादश) ॥
इति द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ २ ॥
अनभिहिते ॥ १ ॥ कर्मणि द्वितीया ॥ २ ॥ तृतीया च होश्छन्दसि ॥ ३ ॥ अन्तराऽन्त-
रेण युक्ते ॥ ४ ॥ कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे ॥ ५ ॥ अपवर्गे तृतीया ॥ ६ ॥ सप्तमीपञ्चम्यौ