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वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 835 में से

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पृष्ठ 263

ण्यः is the sutra; by yogavibhāga of 'परिषदः', ण-प्रत्यय also happens (णोऽपि)"!
Wait! "ण-प्रत्ययः अपि" -> "णोऽपि"!
In some recensions, is the pratyaya अण् or ण?
When ण is added to परिषद्, what do you get?
परिषद् + ण = पारिषद! (Because ण has वृद्धि of अ to आ, giving पारिषद!)
If it were अण्, परिषद् + अण् = पारिषद! (Both ण and अण् have the same effect!)
So "णोऽपि" means: "णः अपि"!!
AND by Sandhi: "योगविभागात् + णः + अपि" ->
योगविभागात् + णः = योगविभागाण्णः!
योगविभागाण्णः + अपि = योगविभागाण्णोऽपि!
Aha! WOW! That makes TOTAL sense!
योगविभागात् + णोऽपि = योगविभागाण्णोऽपि!
Now, look at the text in line 18:
Is there a 'गा'?
Let's look: "यो-ग-वि-भा-गा-ण्णो-ऽ-पि" or "यो-ग-वि-भा-ण्णो-ऽ-पि"?
Wait, look at the space:
यो (1) ग (2) वि