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सर्वकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 835 में से

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in L10: 'त्वाभावान्न' has 'न्न'.
In L15: it has 'त्वा' then 'न्न' or 'त्'?
Wait, look at 'अनुपसर्गत्वात्' vs 'अनुपसर्गत्वान्न':
Ah, look at L15: "अनुपसर्गत्वात् न षः" - wait, there is no space, it is "अनुपसर्गत्वान्न षः"!
Wait, look at L18: "अनुपसर्गत्वान्न षः ।"
Yes, both L15 and L18 have "अनुपसर्गत्वान्न षः"!

Wait, look at L15:
"सु षित्तं किं तवात्र ।"
Wait, is it "सु षित्तं" or "सुषिक्तं"?
Wait! Look at the letter in L15:
"सु षित्तं" or "सु षितं" or "सुषिक्तं"?
Wait, root is षिच् -> क्तः -> सिक्तम्. With षत्व -> षिक्तम्!
Look at L15:
"सु" then space, then "षित्तं" or "षिक्तं"?
Look at the conjunct: it has a loop with a top curve -> 'क्त'! It is 'षिक्तं'!
Wait, look at the top: 'ि' on 'ष', then 'क्तं'!
Yes, "सु षिक्तं किं तवात्र" or "सुषिक्तं