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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 759 में से

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३६ प्रशस्तपादभाष्यम्
निर्णीत नहीं है । अतः ऐसे स्थलों में सपक्ष न मिलने के कारण सपक्ष में साध्य
और हेतु का सामानाधिकरण्य सम्भव न होने से व्याप्ति सम्भव नहीं होगी । अतः
शब्दत्व हेतु में भी सव्यभिचार हेत्वाभास होगा; किन्तु नित्यत्व रूप साध्य का
अभाव निर्णीत है घटादि अनित्य वस्तुओं में, यहाँ शब्दत्व भी नहीं है । अतः पूर्व
कथित व्यभिचार दोष यहाँ सम्भव नहीं है । सुतरां यहाँ नित्यत्व हेतु का केवल
पक्ष में रहना, किसी सपक्ष या विपक्ष में न रहना ही व्याप्ति का विघटक है ।
इसको 'असाधारण' नाम का व्यभिचार कहते हैं; क्योंकि यह हेत्वाभास साध्य के
अधिकरण और साध्याभाव के अधिकरण दोनों में साधारण रूप से (सामान्य रूप
से) नहीं है, जैसे कि साधारण हेत्वाभास रहता है । यह शब्दत्व हेतु केवल शब्द-
रूप पक्ष में ही है, अतः उक्त शब्दत्व हेतु 'असाधारण' नाम का सव्यभिचार है ।
इसी प्रकार जिस स्थल में संसार के सभी वस्तु पक्ष होंगे-जैसे 'सर्वमभिधेयं
प्रमेयत्वात्', ऐसे स्थलों के हेतु में भी उक्त सामानाधिकरण्य संभव नहीं होगा;
क्योंकि प्रकृत स्थल में संसार के सभी वस्तु पक्ष के अन्तर्गत आ गये हैं । सपक्ष
के लिए कोई नहीं बचा है । सपक्ष को पक्ष से भिन्न होना चाहिए । अतः ऐसे
स्थलों में भी हेतु के व्यापक साध्य का किसी सपक्ष में हेतु के साथ रहना सम्भव
नहीं होगा । अतः इस प्रकार के हेतुवों में भी व्याप्ति नहीं रह सकती । फलतः
व्यभिचार रहेगा; किन्तु कथित साधारण या असाधारण व्यभिचार यहाँ सम्भव
नहीं है । अतः 'अनुपसंहारी' नाम का अतिरिक्त ही व्यभिचार दोष माना गया है।
जिससे उक्त हेतु 'अनुपसंहारी' नाम का तीसरा सव्यभिचार होगा ।
अतः तत्त्वचिन्तामणिकार ने अपने सव्यभिचार प्रकरण में लक्षण करने से भी
पहले 'सव्यभिचारस्त्रिविधः संधारणासाधारणानुपसंहारिभेदात्' यह विभाग वाक्य
ही लिखा है । यद्यपि सूत्र-भाष्यादि में इस त्रैविध्य की चर्चा नहीं है ।
फलितार्थ यह है कि सव्यभिचार (१) साधारण, (२) असाधारण और (३)
अनुपसंहारी भेद से तीन प्रकार का है । इनमें जो हेतु साध्य और साध्याभाव
दोनों के साथ रहे, उसे साधारण कहते हैं । जैसे कि 'धूमवान् वह्नेः' का वह्नि हेतु ।
वह्नि हेतु धूम के साथ भी महानसादि में है और धूमाभाव के साथ भी तप्त
अयःपिण्डादि में है । जो हेतु केवल पक्ष में ही रहे, सपक्ष या विपक्ष में जो न रहे,
उस हेतु को 'असाधारण' सव्यभिचार कहते हैं । जैसे कि 'शब्दो नित्यः शब्दत्वात्'
इस अनुमान का शब्दत्व हेतु । यह शब्दत्व हेतु केवल शब्दरूप पक्ष में ही है । न
आकाशादि सपक्षों में है और न घटादि विपक्षों में । अतः शब्दत्व हेतु
'असाधारण' सव्यभिचार है । जिस धर्म का सभी वस्तुओं में केवल अन्वय ही
रहे, व्यतिरेक या अभाव किसी भी वस्तु में न रहे, उस धर्म को केवलान्वयि धर्म
कहते हैं, केवलान्वयि धर्म जिस पक्ष का विशेषण (अवच्छेदक) हो उस पक्ष के