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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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पृष्ठ 201

२४६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणसाधर्म्यवैधर्म्य-
प्रशस्तपादभाष्यम्
बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनानां निमित्तकारणत्वम् ।
संयोगविभागोष्णस्पर्शगुरुत्वद्रवत्ववेगानामुभयथा कारणत्वम् ।
बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और भावना ये
सभी निमित्तकारण (ही) होते हैं ।
संयोग, विभाग, उष्ण स्पर्श, गुरुत्व, द्रवत्व और वेग ये छः गुण
असमवायिकारण भी हैं और निमित्तकारण भी ।
न्यायकन्दली
समवायिकारणसमवायादसमवायिकारणता, आकाशाश्रितेनाकाश एव शब्दान्तरारम्भात् ।
सङ्ख्यापृथक्त्वयोरुभयथा कारणत्वम्, कारणवर्तिनोस्तयोः कार्ये यथासङ्ख्यमेकत्वैकपृथक्त्या-
रम्भकत्वात्, स्वाश्रये द्वित्वद्विपृथक्त्वजनकत्वात् ।
बुद्ध्यादीनां निमित्तकारणत्वम् । तेषां निमित्तकारणत्वमेवेत्यर्थः ।
संयोगविभागोष्णस्पर्शगुरुत्वद्रवत्ववेगानामुभयथा कारणत्वम् । असमवायिकारणत्वं
निमित्तकारणत्वं चेत्यर्थः । तथाहि-भेरीदण्डसंयोगः शब्दोत्पत्तौ निमित्तं भेर्याकाशसंयोगोऽसम-
वायिकारणम् । एवं विभागे दलविभागो निमित्तं वंशदलाकाशविभागोऽसमवायिकारणम् । उष्ण-
स्पर्श उष्णस्पर्शस्यासमवायिकारणं पाकजानां निमित्तकारणम् । गुरुत्वं स्वाश्रये पतनस्यासमवायि-
शब्द अपने कार्य के समवायिकारण (आकाश) में रहने से ही असमवायिकारण
है; क्योंकि आकाश में रहने वाले शब्द से आकाश में ही शब्दों की उत्पत्ति होती
है । संख्या एवं पृथक्त्व ये दोनों ही प्रकार से असमवायिकारण होते हैं; क्योंकि
(कारणगत) ये दोनों कार्यगत एकत्व एवं पृथक्त्व के कारण हैं एवं अपने ही
समवायिकारणरूप आश्रय में ही द्वित्व या द्विपृथक्त्व के कारण हैं ।
बुद्धि प्रभृति इन नौ गुणों का निमित्तकारणत्व साधर्म्य है, अर्थात् ये निमित्त-
कारण ही होते हैं (असमवायिकारण भी नहीं) ।
संयोग, विभाग, उष्ण स्पर्श, गुरुत्व और वेग इन छः गुणों का 'उभयथा कारणत्व'
साधर्म्य है, अर्थात् ये सभी गुण असमवायिकारण और निमित्तकारण दोनों ही होते हैं ।
भेरी और आकाश का संयोग शब्द का असमवायिकारण है एवं भेरी और
आकाश कांसंयोग शब्द का ही निमित्तकारण है एवं विभाग में भी (उभयथा कारणत्व)
है; क्योंकि बाँस के दोनों दलों का विभाग शब्द का निमित्तकारण है एवं बाँस के दल
और आकाश का विभाग शब्द का ही असमवायिकारण भी है । (कारणगत) उष्ण
स्पर्श (कार्यगत) उष्ण स्पर्श का असमवायिकारण है एवं पाकज रूपादि का निमित्त-