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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 160 में से

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पृष्ठ 9

प्रथमोऽध्याय ५
असमवायी वा अनन्वित होना = अभाव है। और नवीन लोग इसको "तादात्म्य
सम्बन्धाऽवच्छिन्नप्रतियोगिताकत्वाऽवच्छिन्नभावनिष्ठप्रतियोगितानिरूपितानुयोगिता
विशेष वाला होना", कहते हैं ॥
ऊपर लिखा नव्य मतमतान्तराद् श्री स्वामी हरिप्रसाद जी कृत वैशे-
षिकदर्शन वैदिक वृत्ति के आश्रय पर लिखा गया है ॥ ४ ॥
अब प्रथम गिनाये छः ६ पदार्थों में से पहिले द्रव्य पदार्थ के विभाग
कहे जाते हैं -
५-पृथिव्यापस्तेजोवायुराकाशं कालो
दिगात्मा मन इति द्रव्याणि ॥ ५ ॥
(पृथिवी) पृथिवी (आपः) जल (तेजः) अग्नि (वायुः) वायु (आकाशं)
आकाश (कालः) समय (दिक्) दिशा (आत्मा) आत्मा (मनः) और
मन (इति) ये (द्रव्याणि) ९ द्रव्य कहलाते हैं ॥
ये नौ "द्रव्य" कुछ तत्त्ववाचक नहीं हैं, किन्तु वैशेषिक शास्त्र में
"द्रव्य" संज्ञा इन ९ पदार्थों की है। सांख्य, योग, वेदान्त की परिभाषा
में पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन को प्रकृति का कार्य होने से प्रकृति
के अन्तर्गत माना है। जिस को यहां न्याय और वैशेषिक में 'आत्मा' कहा है
उसी जीवात्मा परमात्मा (आत्मद्वय) को सांख्य में पुरुष कहा है। बहुत
टीकाकारों ने इन ९ द्रव्यों में नित्य, अनित्य द्रव्यों का विभाग किया है, कोई
कहते हैं कि पृथ्व्यादि ४ अनित्य, शेष नित्य हैं, कोई ३ अनित्य शेष नित्य
मानते हैं, परन्तु वैशेषिक शास्त्रकार ने स्वयं नित्य वा अनित्य कुछ नहीं कहा,
सब यही समझना ठीक है कि सांख्यादि अन्यशास्त्रोक्तसिद्धान्तानुसार जिस को
वैशेषिक, न्याय, मीमांसा में परमाणु और सांख्य, योग, वेदान्त में प्रकृति माना
है, एक वह नित्य है, दूसरा आत्मा नित्य है जिस को न्याय, वैशेषिक में आत्मा,
सांख्य में पुरुष, योग में चेतन वा चिति कहा है। आत्मा व पुरुष वा चिति
में जीवात्मा परमात्मा दोनों का वा किसी एक का प्रकरणानुसार ग्रहण किया
जाता है। शेष सब अनित्य अर्थात् प्रकृति का कार्य हैं ॥ ५ ॥
द्रव्यों का विभाग कहकर अब गुणों का विभाग कहा जाता है। यथा-
६-रूपरसगन्धस्पर्शाःसंख्याः परिमाणानि पृथक्त्वं
संयोगविभागौ परत्वाऽपरत्वे बुद्धयः सुखदुःखे
इच्छाद्वेषौ प्रयत्नाश्च गुणाः ॥ ६ ॥