वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
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(याथार्थ्य) को जानना। इसी से मुक्ति होती है। द्रव्यादि छहों पदार्थों को
निर्देशलक्षणपूर्वक आगे स्वयं ५ वें सूत्र से कहा है। द्रव्यादि छहों के समान
धर्म वा अनुगत धर्म वा साधारण धर्म को साधर्म्य समझो, और इन के विशेष
धर्म वा व्यावृत्त धर्म वा असाधारण धर्म को वैधर्म्य कहते हैं ॥
बहुत लोग जिज्ञासा करेंगे कि पृथिव्यादि द्रव्य और गुण कर्मादि लौ-
किक पदार्थों के तत्त्वज्ञान से मोक्षसिद्धि का कथन तो एक अनौखी बात
है, अन्य सब शास्त्र तो ब्रह्मज्ञान से मोक्ष मिलना मानते हैं। इस का उत्तर
यह है कि आत्मा अनात्मा के भेद से पदार्थ दो प्रकार के हैं, जब तक पृथि-
व्यादि अनात्म पदार्थों का तत्त्व न समझ पड़े तब तक इन से विलक्षण अती-
न्द्रिय आत्मपदार्थ का तत्त्वज्ञान दुर्घट वा दुर्लभ है, इस लिये इस शास्त्र ने
आत्मा और अनात्मा सभी पदार्थों के तत्त्वज्ञान से मोक्षप्राप्ति होना वर्णित
किया है। आत्मतत्त्व के ज्ञान होने पर परमात्मतत्त्व का ज्ञान होता है, जिस
से मोक्ष में आनन्द का अनुभव किया जाता है। न्यायादि ५ दर्शनों में बड़ी
प्रबलता से विविक्तात्मतत्त्वज्ञान का उपदेश करके मुमुक्षु को फिर वेदान्त
द्वारा साक्षात् परमात्मतत्त्व का उपदेश होता है ॥
वैशेषिकाचार्य कणाद मुनि जी ने द्रव्यादि छः ही पदार्थ लिखे हैं, परन्तु
नवीन लोग उदयनाचार्य्यादि ने एक ७ वां पदार्थ अभाव भी माना है। तर्क-
संग्रह से आरम्भ करने वाले इसी ७ पदार्थ के विवाद में पड़कर न्याय वैशे-
षिक के तत्त्व को न समझ कर वृथा वाग्जाल में फंसे रह जाते हैं। सब प्रकार
के अभावपदार्थ वैशेषिक के "पृथक्त्व" नामक गुण के अन्तर्गत हैं और
इसी से आचार्य्य ने पृथक् नहीं गिने। पृथक्त्व=अयोग=वैलक्षण्य=अनेकता;
इन शब्दों का एक ही तात्पर्य्य है। इस लिये प्रागभावादि ३ अभाव तो
अयोग के अन्तर्गत हैं, चौथा अन्योन्याभाव वैलक्षण्य के अन्तर्गत है॥
नवीन आचार्यों के वर्णित अभाव के भेदों को पाठकों के परिचयार्थ यहां
लिखे देते हैं। यथा-अभाव ४ प्रकार का है। १ प्रागभाव, २-प्रध्वंसाभाव,
३-अत्यन्ताऽभाव और ४-अन्योन्याऽभाव। १-प्रागभाव उस को कहते हैं
कि जो कार्य की उत्पत्ति से पूर्व उस (कार्य) का अभाव है, यह अभाव
यद्यपि अनादि है तो भी नाशवान् है, क्योंकि घट की उत्पत्ति होने पर उस
का प्रागभाव नष्ट होगया, नहीं रहा। इस लिये फल यह हुवा कि नाश-
वान् अभाव को प्रागभाव कहते हैं। २-प्रध्वंसाभाव है जो कार्य के नाश