वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 15, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्याय ११
जब उत्पन्न होते हैं उस क्षण में गुणरहित होते हैं, तब उत्पद्यमान घटादि
कार्य द्रव्यों में उस क्षण भर को गुण वाला न होने से लक्षण अव्याप्त रहता,
इस कारण तीसरा विशेषण ' समवायिकारण ' लिखा गया । क्योंकि उत्प-
द्यमान घटादि भी अपने उत्पत्स्यमान गुणों के प्रति समवायिकारण होते हैं ॥
किसी एक लक्ष्य में लक्षण का न घटना अव्याप्ति दोष कहाता है। लक्ष्य
से अन्यत्र भी लक्षण का घट जाना अतिव्याप्ति कहाता है तथा लक्ष्य मात्र
में ही लक्षण का सर्वथा न घटना असंभव कहाता है । ये तीनों दोष न हों,
तब निर्दोष लक्षण होता है । द्रव्य का लक्षण जो इस सूत्र में कहा है, तीनों
दोषों से रहित ठीक है ॥ १५ ॥ अब गुण का लक्षण करते हैं:-
१६-द्रव्याश्रय्यऽगुणवान् संयोगविभागेष्वकारण
मऽनपेक्ष इति गुणलक्षणम् ॥ १६ ॥
जो ( द्रव्याश्रयी ) द्रव्य के आश्रय वाला हो, ( अगुणवान् ) अन्य गुणों
वाला न हो, (संयोगविभागेषु) संयोगों और विभागों में (अनपेक्षः) अपेक्षा
रहित ( अकारणम् ) कारण न हो, (इति) यह ( गुणलक्षणम् ) गुण का लक्षण है ॥
गुण उन को कहते हैं जो किसी द्रव्य का आश्रय अवश्य करते हों, द्रव्य
के विना कहीं न पाये जाते हों, तथा जैसे गुण किसी द्रव्य का गुण है, वैसे
गुण का गुण कोई न हो और जैसे कर्म, संयोग विभागों का सापेक्ष कारण
होता है, वैसा न हो अर्थात् गुण, संयोग विभागों को उत्पन्न नहीं करता
है । यह गुण का लक्षण है । यद्यपि सामान्यादि भी गुणों में रहते हैं परन्तु
सामान्य, विशेष को आचार्य ने स्पष्ट भिन्न पदार्थ कह कर छः पदार्थ गिनाये
हैं, जिस से प्रतीत होता है कि आचार्य भी यह भाव रखते थे कि द्रव्यादि
पदार्थ और सामान्यादि उपपदार्थ हैं ॥ १६ ॥
आगे कर्म का लक्षण करते हैं:-
१७-एकद्रव्यमऽगुणं संयोगविभागेष्वन-
पेक्षकारणमिति कर्मलक्षणम् ॥ १७ ॥
जो (एकद्रव्यम्) एक द्रव्य वाला हो, अनेक द्रव्याश्रयी न हो, (अगुणम्)
जो गुणवान् न हो, (संयोगविभागेषु) संयोगों और विभागों में (अनपेक्ष
कारणम्) निरपेक्ष स्वतन्त्र कारण हो, (इति) यह (कर्मलक्षणम्) कर्म का
लक्षण है ॥