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सर्वकोश
वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya

महर्षि कणाद द्वारा

स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished160 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 160 में से

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पृष्ठ 12

(उत्क्षेपणम्) ऊपर को उठाना (अवक्षेपणम्) नीचे को दबाना (आकु-
ञ्चनम्) सिकोड़ना (प्रसारणम्) फैलाना और (गमनम्) चलना; ये ५
(कर्माणि) कर्म हैं ॥ ७ ॥ द्रव्यों, गुणों और कर्मों का विभाग कह कर अब
द्रव्य गुण कर्म का साधर्म्य किन बातों में है, सो कहते हैं:-
८-सद़नित्यं द्रव्यवतकार्यं कारणं सामान्यविशेषवदिति
द्रव्यगुणकर्मणःऽविशेषः ॥ ८ ॥
(सत्) सत्ता वाला होना (अनित्यम्) होकर न रहने वाला होना
(द्रव्यवत्) किसी समवायी द्रव्य वाला होना (कार्यम्) उत्पन्न होने वाला
होना (कारणम्) किसी का उत्पादक होना (सामान्यविशेषवत्) किसी से
समानता और किसी से विशेषता वाला होना इति) यह (द्रव्यगुणकर्मणाम्)
द्रव्यों, गुणों और कर्मों का (अविशेषः) सामान्य वा साधर्म्य है ॥
प्र०-आत्मा भी तो द्रव्य है, तब क्या वह भी इस सूत्र के अनुसार अनित्य
है ? उ०-इस सूत्र में सभी द्रव्यों वा सभी गुणों का साधर्म्य वा सामान्य नहीं
कहा गया है, किन्तु जिन २ में संभव है, उन २ का विवक्षित है। क्योंकि यदि
सूत्रकार अनित्य न कह कर नित्य कहते तौ कर्म के नित्य न होने से उस से
साधर्म्य कहना अयुक्त होता। वास्तव में न तौ-सब द्रव्य अनित्य हैं, न सब
गुण अनित्य हैं, कोई द्रव्य नित्य हैं, कोई अनित्य हैं। जो नित्य हैं, उन के
गुण भी नित्य हैं। जैसे आत्मा नित्य है, उस का बुद्धि (चेतना=ज्ञान) गुण
भी उस का समवायी सार्थी नित्य है। जो मन आदि द्रव्य अनित्य हैं, उन
के गुण भी अनित्य हैं। बस इस सूत्र में जो अनित्य शब्द है, वह द्रव्यमात्र
की अनित्यता का बोध नहीं कराता, किन्तु जो अनित्य हैं, उन का अनित्य
गुणों तथा अनित्य (अवश्य अनित्य) कर्मों से साधर्म्य है। जो नहीं, उन
का साधर्म्य भी नहीं। जिन २ द्रव्यों में अनित्यता है, उन का कर्मों और
गुणों से साधर्म्य होता है, केवल इतना ही विवक्षित है। इसी बात को
स्वामी श्री हरिप्रसाद जी ने वैदिकवृत्ति में और आर्यमुनि जी ने आर्यभाष्य में
तौ स्वीकार किया ही है, किन्तु इन से पुराने श्री शङ्कर मिश्र ने भी अपने
वैशेषिकसूत्रोपस्कार में लिखा है कि-
“अनित्यमिति ध्वंसप्रतियोगित्वं यद्यपि न परमाण्वादि
साधारणं तथापि ध्वंसप्रतियोगिवृत्तिपदार्थविभाजकोपा-
धिमत्त्वं विवक्षितम्” ॥ ८ ॥