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सर्वकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ३६२ )

भजन ( राग धनाश्री ) ।

हरि बिन और न कोई अपना, हरि बिन और न कोई रे ।
मात पिता सुत बन्धु कुटुम्ब सब, स्वारथके ही होई रे ॥१॥
या कायाको भोग बहुत दे, मरदन कर-कर सोई रे ।
सो भी छूटत नैक न खसकी, संग न चाली घोई रे ॥२॥
घरकी नारि बहुत ही प्यारी, तनमें नहीं दोई रे ।
जीवत कहती संग चर्लुंगी, डरपन लागी सोई रे ॥३॥
जो कहिये यह द्रव्य आपनो, जिन उज्ज्वल मति खोई रे ।
आवत कष्ट रखत रखवारी, चलत प्राय ले जोई रे ॥४॥
इस जगमें कोई हित न दीखे, मैं समझाऊँ तोई रे ।
चरणदास-सुखदेव कहैं, ये सुन लीजो सब कोई रे ॥५॥

भजन ( राग सोरठ ) ।

सुख राखो वा दिनकी कछु तुम, सुख राखो वा दिनकी रे ।
जादिन तेरी यह देह छुटैगी, ठौर बसौगे बन की रे ॥१॥
जिनके संग बहुत सुख कौनूँ, तेरो मुख ढँक होयँगे न्योरे ।
जमके त्रास होयँ वह भाँती, कौनूँ छुटावनहारे रे ॥२॥