वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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कर्म न विकर्म करे, भाव न अभाव घरे ।
शुभ न अशुभ परे, यातें निधरक है ॥
वस तीन शून्य जाके, पापहु न पुण्य ताके ।
अधिक न न्यून जाके, स्वर्ग न नरक है ॥
सुख दुःख सम दोज, नीचहुँ न ऊँच कोज ।
ऐसी विधि रहै सोउ, मिल्थो न फरक है ॥
एकही न दोय जाने, बंध मोक्ष अम मानै ।
सुन्दर कहत, ज्ञानी ज्ञानमें गरक है ॥
जो भीषण माँगकर पेटकी अग्निको शान्त कर लेता है,
पर किसीकी खुशामद नहीं करता, किसीके अधीन नहीं
होता, स्वाधीन रहता है ; राहमें पड़े हुए विधदे उठाकर
उनकी ही गुदड़ी बना कर ओढ़ लेता है ; मान अपमान और
सुख-दुःखको समान समझता है ; न किसीसे कुछ लेता
है और न किसीको कुछ देता है ; गृहस्थीमें या अपने बन्धु-
बान्धवोंमें रहकर भी उनमें समता नहीं रखता ; शुभाशुभ,
याप-पुण्य और स्वर्ग नरकको कोई चीज़ नहीं समझता ; किसी
को नीच और किसीको ऊँच नहीं समझता, सभीमें एक
आत्मा देखता है ; बन्धन और मोक्षको भी मनका संकल्प या
अम समझता है तथा ब्रह्मज्ञानमें गुरू रहता है और उसमें ही
पूर्ण सुख समझता है,—उसमें बढ़कर ज्ञानी और कौन है ?
ऐसे ज्ञानीके जीवनमुक्त होनेमें संशय नहीं । उसे जन्म-