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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 353 में से

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पृष्ठ 69

द्वितीय अध्याय 41
जो विनियोग के योग्य है, वह मन्त्र है। विधि एवं स्तुति करने वाला शेष भाग
ब्राह्मण है। इन मन्त्रों में कहीं स्तुति, कहीं याचना, कहीं आशीर्वाद, कहीं विधि,
प्रेरणा, प्रश्न, अवधारण, प्रवाहिलका, आज्ञा या रहस्य कथन है।
वर्तमान काल में जो वैदिक साहित्य प्राप्त होता है वह चार प्रकार का है- (१)
संहिता (२) ब्राह्मणग्रन्थ (३) आरण्यक (४) उपनिषद्। ये सभी रचनाएँ परस्पर
सम्बद्ध हैं। इनमें से अनेक रचनाएँ लुप्त भी हो गई हैं। यहाँ पर क्रमशः इन रचनाओं
का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है। इनका विस्तृत विवेचन इसी पुस्तक में
आगे इन विषयों के पृथक् अध्यायों में किया गया है।
१. संहिता :- मन्त्रों के समूह की संज्ञा "संहिता" है। यज्ञानुष्ठान हेतु भिन्न भिन्न
ऋत्विजों के उपयोगार्थ इन मंत्रों का संकलन तथा सम्पादन किया गया। दुर्गाचार्य
(निरुक्तवृत्ति १/०) के अनुसार- "वेदं तावदेकं सन्तम् अतिमहत्वाद् दुरध्येयमनेक
शाखाभेदेन समाम्नासिषुः। सुख ग्रहणाय व्यासेन समाम्नातवन्तः।" अर्थात् इन मन्त्रों
का संकलन कार्य अतिमहत्त्वपूर्ण होने के कारण वेद व्यास जी द्वारा सम्पन्न किया
गया। महाभारत के अनुसार व्यासकर्म करने के कारण उन्हें वेदव्यास का सम्बोधन
प्राप्त हुआ- "वेदान् विव्यास यस्मात्, स वेदव्यास इति स्मृतः।" अर्थात् जिसने वेदों
को विन्यस्त किया वह "वेदव्यास" के नाम से स्मरण किया जाता है। अतः संहिता
से तात्पर्य सूक्तों, मन्त्रों, देवस्तुतियों तथा याज्ञिक नियमों एवं विधियों से है। संहिताएँ
ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्व के भेद से चार प्रकार की होती हैं। क्रमशः विवेचन
प्रस्तुत है-
(अ) ऋक् संहिता :- यह वेद पदार्थ-विज्ञान का सूचक, भौतिक वस्तुओं को
गुणों का निर्देशक और विश्व की सर्वप्राचीन रचना है। महाभाष्यकार पतञ्जलि ने
इसकी २१ शाखायें मानी हैं। चरण व्यूह में यह लिखा हुआ है कि अध्येताओं के
कारण ऋग्वेद की पाँच शाखाएँ हुई हैं जो इस प्रकार हैं-
(१) शाङ्खायन (२) शाकल (३) बाष्कल (४) माण्डूक्य (५) आश्वलायन।
श्रीमद्भागवत तथा विष्णु-पुराण में वात्स्य तथा मौद्गल नामक दो शाखाओं का
अधिक उल्लेख हैं-
शाकलस्य शतं शिष्या नैष्ठिकाब्रह्मचारिणः।
पञ्चतेषां गृहस्थास्ते धर्मिष्ठाश्च कुटुम्बिनः॥
शिशिरो बाष्कलः शांखो वात्स्यश्चैवाश्वलायनः।
पञ्चैते शाकलाः शिष्याः शाखाभेदप्रवर्तकाः॥