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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 353 में से

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पृष्ठ 227

तृतीय अध्याय 199
धर्म के आधार पर ही होता है। धर्मरहित राजनीति का कोई अर्थ नहीं होता है।
ऋग्वेद में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के परिप्रेक्ष्य में धर्म दर्शन का वर्णन प्राप्त होता
है। धर्म से जब मानव जीवन संचालित होता है तो जीवन का कोई भी क्षेत्र चाहे
वह पारिवारिक जीवन हो, राजनीतिक या सामाजिक हो, धार्मिक पृष्ठभूमि या
नैतिक पृष्ठभूमि से अलग हो ही नहीं सकता है।
एतेना॑ग्ने॒ ब्रह्म॑णा वावृधस्व॒ शक्ती॑ वा॒ यत्तै॑ चकृ॒मा वि॒दा वा॑ ।
उ॒त प्र णै॒ष्यभि वस्यो॒ अस्मान्त्सं न॑ः सृज सु॒मत्या वाज॑वत्या ॥१
अर्थात् 'जो मनुष्य वेद की रीति से धर्मयुक्त व्यवहार करते हैं वे ज्ञानवान् और
श्रेष्ठमति वाले होकर जिस उत्तम विद्वान् की सेवा करते हैं, वह उनको श्रेष्ठ सामर्थ्य
और उत्तम विद्या संयुक्त करता है।'
जो धर्मपूर्ण व्यवहार करते है उनकी विचारधारा, क्रियाकलाप सभी धर्मपूर्ण
होते हैं। इससे समाज, राज्य और स्वयं व्यक्ति का बहुमुखी विकास होता है। व्यक्ति
श्रेष्ठता को प्राप्त होता है। अतः सदैव ही उसे धर्मानुकरण ही करना चाहिये।
त्वं न॑ः सोम वि॒श्वतो॒ रक्षा॑ राजन्न॒घायत॑ः। न रि॑ष्ये॒त्वार्व॑तः॒ सखा॑ ॥२
अर्थात् मनुष्यों को इस प्रकार ईश्वर की प्रार्थना करके उत्तम यत्न करना चाहिये
कि जिससे धर्म के छोड़ने और अधर्म के ग्रहण करने की इच्छा मन में जागृत ही न
हो सके। धर्म और अधर्म की प्रवृत्ति में मन की इच्छा ही कारण है, उसकी प्रवृत्ति पर
अंकुश लगाने के लिए मनुष्य को आत्मनियंत्रण की आवश्यकता होती है, जिससे धर्म
के त्याग एवं अधर्म के ग्रहण की सम्भावना ही न रहे।
मानव मन चंचल होता है और उसको अपने मत पर धर्माचरण द्वारा ही नियंत्रण
रखना होता है। सद्‌संगति और सद्‌विचारों से ही उसकी विचारधारा धर्मपूर्ण रहती है
जो कि स्वयं उसके लिए और राष्ट्र के लिए उत्तम होती है।
तत्तै॑ भ॒द्रं यत्समि॑द्धः॒ स्वे दमे॒ सोमा॑हुतो॒ जर॑से मृ॒ळय॑त्तमः ।
दधा॑सि॒ रत्नं॑ द्रवि॑णं च दा॒शुषेऽग्ने॒ सख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥३
अर्थात् 'मनुष्यों को चाहिए कि अपने आचरण एवं विचारों को धर्मपूर्ण बनाये
रखने के लिए वेद प्रमाण और सृष्टिक्रम के प्रमाण तथा सद्पुरुषों, ईश्वर और विद्वान्
१. ऋग्वेद १/३१/१८
२. ऋग्वेद १/९१/८
३. ऋग्वेद १/९४/१४