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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 353 में से

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पृष्ठ 181

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द्वितीय अध्याय 153
साम का अर्थ- 'साम' शब्द का एक अतीव सुन्दर निर्वचन बृहदारण्यक-
उपनिषद् में उपलब्ध होता है। उसके अनुसार 'सा च अमश्चेति तत्साम्नः सामत्वम्'
(बृह०उ० १/३/२२)। अर्थात् साम का निर्वचन सा+अम हुआ। 'सा' का अर्थ है
ऋचा तथा 'अम' का अर्थ है स्वर। यह स्वर ही ऋचा को साम का रूप देता है।
अतः 'साम' शब्द का निष्पत्ति से प्राप्त अर्थ हुआ ऋक् के साथ सम्बन्धित स्वर प्रधान
गायन अर्थात् 'तया सहसम्बद्ध अमो नामस्वरः यत्र वर्तते तत् साम्।' ऋग्वेद में भी
अनेक पदों द्वारा स्तुति को गान के साथ संयुक्त किया गया है। जैसे 'एतोन्विन्द्रं
स्तवाम शुद्धं शुद्धेन साम्न' (ऋ० ८/९५/७) अर्थात् हम शुद्ध प्रभु की शुद्ध साम
गान से स्तुति करें तथा 'इन्द्राय साम गायत' (ऋ० ८/९८/१) अर्थात् प्रभु के लिए
साम को गाओ, आदि के द्वारा स्तुति को गान से जोड़ा गया है। स्तुति परमेश्वर की है
तथा स्तोता कवि है। कवि की उत्पत्ति साम स्वरावली से होती है- 'त्वष्टा जनयत्
साम्नः कविः' (ऋ०२/२३/१७) अर्थात् साम का कवि सर्वज्ञ आपको प्रकट करता
है। वे ऋचाएँ जिन पर साम का गायन किया जाता है, 'सामयोनि' कहलाती हैं। साम
संहिता इन्हीं सामयोनियों का संकलन है। 'साम' शब्द के मुख्य वाच्य गानों का
संकलन- 'गान संहिता' के नाम से जाना जाता है।
वस्तुतः 'साम' शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त होता है। एक तो ऋक् मन्त्रों के लिए
तथा दूसरे ऋक् मन्त्रों के ऊपर गाए जाने वाले गानों के लिए। अतः साम का
मूलाधार ऋक् मन्त्र ही है। ऋषियों ने साम तथा ऋक् के प्रगाढ़ सम्बन्ध को द्योतित
करने के लिए दाम्पत्य-भाव की कल्पना की है। अथर्ववेद के अनुसार 'अमोऽहमस्मि
सा त्वं सामाहमस्म्यृक्त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वम्, ताविह सं भवाव प्रजाम जनयावहै'
(अथर्व० (१४/२/७१), अर्थात् (हे वधू!) मैं ज्ञानवान हूँ, सो तू (ज्ञानवती है।) मैं
सामवेद हूँ, तू ऋग्वेद की ऋचा हैं। मैं सूर्य हूँ और तू पृथिवी है। वे हम दोनों यहाँ
पराक्रमी होवें तथा प्रजा को उत्पन्न करें।
जब ऋचा संगीत के स्वरों, तानों तथा लयों से बँधी होती है, तो वह 'साम'
कहलाती है। जैमिनि ने अपनी मीमांसा के सूत्र २/१/३६ में कहा है- 'गीतिषु
सामाख्या' अर्थात् सामवेद की साम संज्ञा गीतों के कारण है। छान्दोग्य उपनिषद् 'स्वर'
के साम का स्वरूप कहा गया है। उसके अनुसार 'का साम्नों गतिः ? स्वर इति होवाच'
(छा०उ०१/८/४) अर्थात् साम की गति क्या है ? साम की गति स्वर अथवा तान में है।
अतः संगीत का सौन्दर्य ही सामवेद को साम संज्ञा से विभूषित करता है।
सामवेद का विभाजन :- सामवेद मुख्यतः दो भागों में संविभक्त है- आर्चिक
तथा गान। आर्चिक का तात्पर्य है- ऋक् समूह। आर्चिक के भी पूर्वार्चिक तथा

CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar