वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)
Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System
डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 353 में से
संदर्भ में पढ़ें136 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता
आचार्य सायण ने भी इसीलिए ऋग्वेद से भी पूर्व यजुर्वेद की तैत्तरीय संहिता पर
भाष्य लिखा। इसका कारण बतलाते हुए उन्होंने स्वयं कहा- "एवं सति
अध्वर्युसम्बन्धिनि यजुर्वेद निष्पन्नं यज्ञशरीरमुपजीव्यं तदपेक्षितौ स्तोत्रशास्त्ररूपौ
अवयवौ इतरेण वेदद्वयेन पूर्य्यते इत्युपजीव्यस्य यजुर्वेदस्य प्रथयतो व्याख्यानं
युक्तम्।"
तथा
आध्वर्यवस्य यज्ञेषु प्राधान्याद् व्याकृतः पुरा।
यजुर्वेदोऽथ होत्रार्थमृग्वेदो व्याकरिष्यते॥'
अर्थात् यज्ञ में आध्वर्यव की प्रधानता होने के कारण पहले यजुर्वेद की व्याख्या
की गई, तत्पश्चात् होत्र के लिए ऋग्वेद की व्याख्या की गई।
ऋग्वेदीय ऋचाओं की पुनरावृत्ति :- प्राचीन काल में यजुर्वेद के प्रमुख विषयों
का ऋचाओं में ही प्रतिपादन हुआ। तत्पश्चात् विषयों के स्पष्टीकरण के लिए इसमें
गद्यांशों का भी समावेश हो गया। अतः इसे 'यजुः' के नाम से सम्बोधित किया गया
और इसी आधार पर इस वेद को 'यजुर्वेद' कहा जाने लगा। यजुर्वेद में उपलब्ध
गद्यभाग काव्य, लय तथा ताल से अनुगत होता है। ध्यान दिए जाने पर यह ज्ञात
होता है कि यजुर्वेद में उपलब्ध अधिकांश ऋचाएँ ऋग्वेद में भी दृष्टिगोचर होती हैं।
इन समान ऋचाओं के यजुर्वेद में मात्र पाठान्तर ही प्राप्त होते हैं। यजुर्वेद की ऋचाएँ
ऋग्वेदीय मन्त्रों से पूर्वकालीन तो नहीं है, किन्तु फिर इस सामान्य परिवर्तन के साथ
ऋचाओं की पुनरावृत्ति का कारण क्या है? विचार करने पर विदित होता है कि यह
सब अकारण नहीं है अपितु इसमें कोई विशेष उद्देश्य निहित है। इनका उद्देश्य याज्ञिक
नियमों को निकट ऋचाओं की स्थापना करना है। इसीलिए यजुर्वेद में ऋग्वेद का
कोई सम्पूर्ण सूक्त नहीं उद्धृत किया गया, अपितु ऋचाओं की पृथक्-पृथक् आवृत्ति
ही दृष्टिगत होती है।
सम्प्रदाय :- यजुर्वेद कर्मकाण्ड का वेद है। यह दो सम्प्रदायों से सम्बद्ध है। इन
सम्प्रदायों की संज्ञा निम्नलिखित है-
(१) ब्रह्म सम्प्रदाय, (२) आदित्य सम्प्रदाय।
शतपथ ब्राह्मण के अनुसार :- 'आदित्यानीमानि शुक्लानि यजूंषि वाजसनेयेन
याज्ञवल्क्येनाख्यायन्ते' (शत०- १४/९/५/३३) अर्थात् आदित्ययजुः शुक्लःयजुष् के
नाम से जाना जाता है और यह याज्ञवल्क्य ऋषि के द्वारा व्याख्यात है। इसीलिए
शुक्लयजुर्वेद को आदित्य सम्प्रदाय का प्रतिनिधि माना जाता है। कृष्णयजुर्वेद को
ब्रह्म-सम्प्रदाय का प्रतिनिधित्व प्राप्त है। यह दक्षिण में अधिक प्रचलित है।