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सर्वकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 364 में से

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पृष्ठ 320

२९४ उपदेशसाहस्री
“इदं सर्वं यदयमात्मा”, “स एषोऽकलः”, अनन्तरोऽबाह्यः “अनन्तरमबाह्यम्”, “स बाह्याभ्यन्तरो
ह्यजः”, ब्रह्मैवेदम् “एतया द्वारा प्रापद्यत”, “प्रज्ञानस्य नामधेयानि”, “सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म”,
“तस्माद्वा एतस्मात्”, “तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्”, “एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी”, “अशरीरं
शरीरेषु”, “न जायते म्रियते वा विपश्चित्”, “स्वप्नान्तं जागरितान्तम्”, “स म आत्मेति विद्यात्”,
“यस्तु सर्वाणि भूतानि”, “तदेजति तन्नैजति”, “वेनस्तत्पश्यन्”, “तदेवाग्निः”, “अहं मनुरभवं
सूर्य्यश्च”, “अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम्”, “सदेव सोम्य”, “तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि”,
इत्यादिश्रुतिभ्यः ॥३७॥
हृदयस्पर्शिनी
अत इति—अतः रूपादि संस्कारादि अशुद्धि का संबंध न होने से प्रत्यक्षादि प्रमाण से कोई विरोध भी
नहीं है। अतः 'तू परमात्मा से भिन्न नहीं है' इस प्रकार तुझे समझना चाहिये। 'मैं परमात्मा ही हूँ' यही समझना
उचित है। 'उसने आत्मा को ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ'१, “एक रूप से ही देखना चाहिये”२, “मैं ही नीचे हूँ ३ आत्मा
ही नीचे है”४, “सबको आत्मस्वरूप देखे”५, “जिस अवस्था में इसे सब कुछ आत्मा ही हो जाता है”६, “यह जो कुछ
है, आत्मा ही है”७, “वह यह आत्मा निष्कल है”८, “यह न अन्तर है न बाह्य है”९, “वह बाहर भीतर विद्यमान एवं
अजन्मा है”१०, “यह ब्रह्म ही है”११, “इसी के द्वारा प्रविष्ट हुआ”१२, “प्रज्ञान के ही नाम है”१३, “ब्रह्म सत्य ज्ञान और
अनन्तरूप है”१४ “उस इस आत्मा से आकाश उत्पन्न हुआ”१५, “उसे रचकर उसी में अनुप्रविष्ट हो गया”१६, “समस्त
भूतों में एक सर्वव्यापी देव छिपा हुआ है”१७, “वह शरीरों में अशरीरी है”१८, “वह न उत्पन्न होता है, न मरता है”१९,
“जो स्वप्न और जाग्रत् दोनों अवस्थाओं के पदार्थ को देखता है”२०, “वह मेरा आत्मा है, ऐसा जाने”२१, “जो समस्त
भूतों को अपने में देखता है”२२, “वह गमन करता है और नहीं भी करता है”२३, “ज्ञानियों ने उसे देखा है”२४, “वही
अग्नि है”२५, “मैं मनु हुआ और मैं सूर्य भी हुआ”२६, “वह जीवों के भीतर प्रविष्ट हुआ, जीवों का शासन करनेवाला
है”२७, “हे सोम्य ! पहले सत् ही था”२८, “वह सत्य है, वह आत्मा है, और वही तू है”२९—इत्यादि श्रुतियों से भी
यही सिद्ध होता है। इस अनुच्छेद के द्वारा यह बताया गया है कि रूपादि संस्कारादि अशुद्धि का संबंध न होने के
कारण ही प्रत्यक्षादि विरोध भी नहीं है। अतः तू परमात्मा से भिन्न नहीं है। इसलिये तू परमात्मा ही है। ब्रह्म को
आत्मा से अभिन्न ही समझो ॥ ३७ ॥
१. ( बृ. उ. १।४।१० ) २. ( बृ. उ. ४।४।२० )
३. ( छा. उ. ७।२५।१ ) ४. ( छा. उ. ७।२५।२ )
५. ( बृ. उ. ४।४।२३ ) ६. ( बृ. उ. ४।५।१५ )
७. ( बृ. उ. २।४।६, ४।५।७ ) ८. ( प्र. उ. ६।५ )
९. ( बृ. उ. २।५।१९, ३।८।८ ) १०. ( मुं. उ. २।१।२ )
११. ( मुं. उ. २।२।११ ) १२. ( ऐ. उ. ३।१२ )
१३. ( ऐ. उ. ५।२ ) १४. ( तै. उ. २।१ )
१५. ( तै. उ. २।१ ) १६. ( तै. उ. २।६ )
१७. ( श्वे. उ. ६।११ ) १८. ( कठ उ. २।२२ )
१९. ( कठ उ. २।१८ ) २०. ( कठ. उ. ४।४ )
२१. ( कौ. उ. ३।८ ) २२. ( ई. उ. ५, ६ )
२३. ( महाना. उ. २।३ ) २४. ( महाना. उ. १।७ )
२५. ( बृ. उ. १।४।१० ) २६. ( बृ. उ. १।४।१० )
२७. ( तै. आ. ३।११ ) २८. ( छां. उ. ६।२।१ )
२९. ( छां. उ. ६।८।७ )