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सर्वकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 311, कुल 364 में से

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पृष्ठ 311

सद्रूप ब्रह्म ही मायावशात् वाच्य-वाचक के आकार में अभिव्यक्त आकाशादि शब्दार्थरूप हो गया। किन्तु चिदात्मा
की अर्थात् चिद्रूप की अचित् आकाश के रूप में निष्पत्ति कैसे हुई ? इस शंका का समाधान 'स्वच्छ जल से उसके मलरूप
फेन के समान' इस दृष्टान्त से हो जाता है। अतः यह ठीक ही कहा गया है कि आकाश संज्ञकभूत परमात्मा से
उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार फेन, न तो जल ही है और न जल से अत्यन्त भिन्न ही है, क्योंकि उसकी जल से पृथक्
उपलब्धि नहीं होती। फेन का सलिल से भेद न रहने पर सलिल का भी उससे भेद नहीं है। और मलरूप फेन से
स्वच्छ जल भिन्न भी है। अतः न तो जल ही फेन है और न वह उससे भिन्न ही है, अपितु अनिर्वचनीय है।
यह अनिर्वचनीयता श्रुतिप्रमाण से सिद्ध है १। उसी प्रकार फेनस्थानीय 'नाम' और 'रूप' से भिन्न परमात्मा शुद्ध
और प्रसन्न है, उससे विलक्षण वे फेनस्थानीय 'नाम' और 'रूप' अव्याकृत अवस्था में रहते हुए जब व्यक्त (व्याकृत)
किये जाने लगे तब उनका नाम 'आकाश' और आकाश की ही आकृति कर दी गई ॥ १९ ॥
ततोऽपि स्थूलभावमापद्यमाने नामरूपे व्याक्रियमाणे वायुभावमापद्येते, ततोऽप्यग्निभावम्,
अग्नेरब्भावं, ततः पृथिवीभावम्— इत्येवंक़्रमेण *पूर्वपूर्वभावस्योत्तरोत्तरानुप्रवेशेन पञ्च महाभूतानि
पृथिव्यन्तान्युत्पद्यन्ते । ततः पञ्चमहाभूतगुणविशिष्टा पृथिवी । पृथिव्याश्च पञ्चात्मिका† व्रीहियवाद्या
ओषधयो जायन्ते । ताभ्यो भक्षिताभ्यो लोहितं, शुक्लं च स्त्रीपुंशरीरसम्बन्धि जायते । तदुभयमृतु-
कालेऽविद्याप्रयुक्तकामखजनिर्मथनोद्भूतं मन्त्रसंस्कृतं गर्भाशये निषिच्यते । तत् स्वयोनिरसानुप्रवेशेन
विवर्धमानं गर्भीभूतं नवमे, दशमे वा मासि जायते ॥२०॥
हृदयस्पर्शिनी
तत इति—आकाश के रूप में स्थित वे नाम और रूप और भी अधिक स्थूल भाव में व्यक्त (व्याकृत) किये
गये तब वे वायुभाव को प्राप्त हुए। यह स्थूलभाव क्या है ? स्पर्शगुण की उसमें वृद्धि हो गयी। जो नाम-रूप आकाशभाव
को प्राप्त हुए थे, वे ही और अधिक व्यक्त होने पर वायुभाव को प्राप्त हो जाते हैं—इस कथन से एक विकार अन्य विकार
का उपादान कारण नहीं है, इसे सूचित किया गया है। वायुभाव को प्राप्त हुए नाम-रूप को जब और अधिक व्यक्त किया
तब वे अग्निभाव को प्राप्त हुए, उन्हीं को और अधिक व्यक्त करने पर वे जलभाव को प्राप्त हुए, और भी अधिक
व्यक्त किये जाने पर वे पृथिवी भाव को प्राप्त हुए। इस प्रकार उनमें पूर्व-पूर्व की अपेक्षा एक-एक गुण की वृद्धिरूप
स्थूलता आ गई। अर्थात् क्रमशः पूर्व-पूर्व के अनुप्रवेश द्वारा पृथिवी पर्यन्त पाँच महाभूत उत्पन्न हुए। तदनन्तर पाँचभूतों
के गुणों से युक्त पृथिवी उत्पन्न हुई। पृथिवी से पञ्चीकृत भूतों द्वारा उत्पन्न व्रीहि-यवादि औषधियाँ उत्पन्न होती हैं।
तथा भक्षण की हुई उन औषधियों से स्त्री और पुरुष के शरीरों से सम्बन्धित रज और वीर्य उत्पन्न होते हैं। ऋतुकाल
में अविद्या प्रयुक्त कामरूप मन्थनदण्ड के मन्थन से आविर्भूत हुए वे दोनों रज और वीर्य मन्त्रों२ द्वारा संस्कारयुक्त होकर
गर्भाशय में सींचे जाते हैं और पश्चात् अपनी-अपनी योनि के रसानुप्रवेश से बढ़ते हुए वे गर्भरूप में परिणत हुए रज और
वीर्य नवम या दशम मास में जन्म लेते हैं ॥ २० ॥
तज्जातं लब्धनामाकृतिकं जातकमादिभिर्मन्त्रसंस्कृतं पुनःउपनयनसंस्कारयोगेन ब्रह्मचारिसंज्ञं
भवति । तदेव शरीरं पत्नीसंयोगसंस्कारयोगेन गृहस्थसंज्ञं भवति । तदेव वनस्थसंस्कारेण तापससंज्ञं
भवति । तदेव क्रियाविनिवृत्तिनिमित्तसंस्कारेण परिव्राट्संज्ञं भवति । इत्येवं त्वत्तो भिन्नं भिन्नजात्यन्वय-
संस्कारं शरीरम् ॥२१॥
१. "वाचारंभणं विकारो नामधेयम् ।” (छां. उ. ६।१।४)
२. “गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति ।” (तै. सं. १।१३)

  • भवस्य ०—पाठान्तरम् । † पञ्चात्मवयः, पञ्चात्मकाः —पाठौ ।