उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 364 में से
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में एक-दूसरे की अपेक्षा से प्रधानता और अप्रधानता मानी जाती है। इसी प्रकार युक्तिपूर्वक इनके विशेष्य-
विशेषणभाव को भी समझना चाहिये ॥ ९२ ॥
ममेदं द्वयमप्येतन्मध्यमस्य विशेषणम् ।
धनी गोमान्यथा तद्वद्देहोऽहंकर्तुरेव च ॥९३॥
ममेति—'मम' और 'इदम्'—ये दोनों पूर्व श्लोक (९१) के मध्य में निर्दिष्ट 'अहमर्थ' के विशेषण हैं।
जिस प्रकार 'धनी' और 'गोमान्' इनमें 'धन' और 'गो' दोनों 'पुरुष' के विशेषण हैं, उसी प्रकार 'शरीर' भी 'अहंकार'
का विशेषण है ॥ ९३ ॥
हृदयस्पर्शिनो
उक्त विशेष्य-विशेषणभाव का विवेचन करते हैं—'मम' और 'इदम्' ये दोनों पूर्व श्लोक (९१) के मध्य में
निर्दिष्ट अहमर्थ के विशेषण हैं। जिस प्रकार 'धनी' तथा 'गायवाला' इनमें 'धन' और 'गो' पुरुष के विशेषण हैं, उसी
प्रकार शरीर, अहंकार का विशेषण है। श्लोक ९२ और ९३ में यह आशय व्यक्त किया गया है कि जिन लोगों को
आत्मा और अनात्मा (देहादि) के भेद का ज्ञान रहता है, वे लोग बाह्य पदार्थों की अपेक्षा उत्तरोत्तर आभ्यन्तर पदार्थों
को प्रधान मानते हैं। अतः जिस प्रकार धन के कारण मनुष्य को धनी तथा गौ के कारण गायवाला कहते हैं, और ये
शब्द उसके विशेषण होते हैं, उसी प्रकार 'मम' 'इदम्' आदि समस्त प्रत्यय 'आत्मा' के विशेषण हैं। यहाँ प्रधान को
विशेष्य और अप्रधान को विशेषण समझना चाहिए। 'आत्मा' सभी की अपेक्षा प्रधान और आन्तरतम है। इसलिए
वही सबका विशेष्य है ॥ ९३ ॥
बुद्धयारूढं सदा सर्वं साहंकर्त्रा च साक्षिणः ।
तस्मात्सर्वोवभासो ज्ञः किञ्चिदप्यस्पृशन्सदा ॥९४॥
बुद्धचेति—बुद्धिवृत्ति के विषयभूत सभी पदार्थ और उसी प्रकार 'अहंकार' के सहित सूक्ष्म विषय, ये सभी
'साक्षी आत्मा' के विशेषण हैं। अतः 'आत्मा' उनमें से किसी का भी स्पर्श नहीं करता, तथापि सबको प्रकाशित करता
रहता हैं। क्योंकि वह (आत्मा) ज्ञानस्वरूप है ॥ ९४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
समस्त पदार्थ बुद्धिवृत्ति के विषय हैं। वे अहंकार के सहित सबके साक्षी, अतिसूक्ष्म आत्मा के विशेषण
हैं। अतः आत्मा किसी को भी स्पर्श न करता हुआ सर्वदा सबको प्रकाशित करता हुआ ज्ञानस्वरूप है ॥ ९४ ॥
प्रतिलोममिदं सर्वं यथोक्तं लोकबुद्धितः ।
अविवेकधियामस्ति नास्ति सर्वं विवेकिनाम् ॥९५॥
प्रतिलोममिति—साधारण लोगों की बुद्धि के अनुसार पूर्व बताया हुआ सम्पूर्ण विशेषण-विशेष्य भाव विपरीत
(प्रतिलोम) है। वास्तव में वह विशेषण-विशेष्य भाव का क्रम विवेकरहित पुरुषों की दृष्टि से होता है, किन्तु विवेकी पुरुषों
की दृष्टि में वह सब नहीं है ॥ ९५ ॥
हृदयस्पर्शिनी
यह उक्त मार्ग विवेकी लोगों का है। किन्तु अविवेकियों का उसके विपरीत है। अर्थात् उक्त विशेष्य-
विशेषणभाव लौकिक व्यवहार में विपरीत दिखाई देता है। वास्तव में यह विशेष्य-विशेषणादि क्रम विवेकहीन पुरुषों
की दृष्टि से है। निष्कर्ष यह है कि यह विशेष्य-विशेषणभाव उन्हीं की दृष्टि से है, जो आत्मा और अनात्मा दोनों की
स्वतन्त्र सत्ता मानते हैं, और आत्मा की अपेक्षा अनात्मा को प्रधान समझते हैं। किन्तु तत्त्वज्ञों की दृष्टि में तो आत्मा
से भिन्न किसी भी वस्तु की सत्ता ही नहीं है। इस कारण यह विशेष्य-विशेषणभाव भी नहीं है। संसारी पुरुष तो