उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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हृदयस्पर्शिनी
अतः वेदान्त के सिद्धान्त से पृथक् विविध वादियों के द्वारा बन्ध-मोक्षादि की जो कल्पनाएँ की गई हैं, वे
श्रुति-स्मृति के न्यायों से बाधित होने के कारण मानने योग्य नहीं हैं। परिशेषात् आत्मा के बन्ध-मोक्ष का जो प्रतिभास
होता है, वह भ्रम ही है, ऐसा श्रुति आदि ने कहा है। बन्ध-मोक्ष के भ्रम के अतिरिक्त जो उनके स्वरूप की और उनके
हेतुओं की कल्पनाएँ अन्य लोगों के द्वारा की गई हैं, वे कभी भी मानने योग्य नहीं हैं। सांख्य, कणाद और बौद्धों की
कल्पनाएँ तो सर्वथा विचारशून्य ही हैं ।। ६४ ।।
शास्त्रयुक्ति*विहीनत्वान्नादार्तव्याः कदाचन ।
शक्यन्ते शतशो वक्तुं दोषास्तासां सहस्रशः ।।६५।।
शास्त्रेति - उन सांख्यादि दार्शनिकों की बन्ध-मोक्ष विषयक कल्पनाएँ शास्त्र और युक्ति के विरुद्ध हैं। अतः
उन कल्पनाओं में आदरबुद्धि नहीं करनी चाहिये । अर्थात् वे कल्पनाएँ उपेक्षणीय हैं। क्योंकि उन कल्पनाओं में सैकड़ों-
हजारों दोष बताये जा सकते हैं ।। ६५ ।।
हृदयस्पर्शिनी
शास्त्र और युक्ति दोनों से विरुद्ध होने के कारण वे कल्पनाएँ किसी भी तरह आदरणीय नहीं है, क्योंकि
उनमें सैकड़ों-हजारों दोष बताये जा सकते हैं ।। ६५ ।।
अपि निन्दोपपत्तेश्च यान्यतोऽन्यानि चेत्यतः ।
त्यक्त्वादृतो ह्यन्यशास्त्रोक्तोर्मतिं कुर्याद्दृढां बुधः ।।६६।।
अपीति- 'यान्यतोऽन्यानि' आदि वचनों से वेदान्तशास्त्र के अतिरिक्त शास्त्रों की निन्दा की गई है। अतः
उन शास्त्रों के कथन की उपेक्षा करके विद्वान् पुरुष को चाहिये कि वह वेदान्तशास्त्र के सिद्धान्तों में सुदृढ निष्ठा रखे ।।६६।।
हृदयस्पर्शिनी
मनु एवं सूत संहिता आदि में वेदान्तातिरिक्त शास्त्रों की निन्दा की गई है। अतः वेदान्त से भिन्न शास्त्रों
की उपेक्षा करके बुद्धिमान् मुमुक्षु वेदान्तशास्त्र में ही अपनी निष्ठा को दृढ़ करे । मनु कहते हैं कि इस पृथ्वीपर
वेदान्तशास्त्र से भिन्न जो विविध शास्त्र हैं, उन सब से धर्मशुद्धि चाहने वाला विद्वान् पुरुष सशंक रहे । जितनी भी
वेदबाह्य स्मृतियाँ तथा कुतर्क हैं, वे सभी निष्फल हैं और मृत्यु के पश्चात् निरय में ले जाने वाली हैं ऐसा कहा
गया है¹ ।। ६६ ।।
श्रद्धाभक्ती पुरस्कृत्य हित्वा सर्वमनार्जवम् ।
वेदान्तस्यैव तत्त्वार्थे व्यासस्याभिमते** तथा ।।६७।।
श्रद्धेति - मुमुक्षु विद्वान् को चाहिये कि वह सब प्रकार की कुटिलता को त्याग कर श्रद्धा एवं भक्ति के साथ
साक्षात् नारायणावतार भगवान् व्यास के द्वारा अभिमत वेदान्तगम्य तत्त्वार्थ में अपनी बुद्धि को लगावे और उसे उसी में
स्थिर रखे ।। ६७ ।।
हृदयस्पर्शिनी
विद्वान् मुमुक्षु को चाहिये कि वह सर्वविध कुटिलता का त्याग करके श्रुत्युक्त अर्थ में विश्वास ( श्रद्धा )
और उसके प्रति तत्परता (भक्ति) के साथ भगवान् व्यास के अभिमतवेदान्त प्रतिपादित तत्त्व में ही अपनी बुद्धि
को दृढ़ करे ।। ६७ ।।
१. 'यान्यतोऽन्यानि शास्त्राणि पृथिव्यां विविधानि वै । शङ्कनीयानि विद्वद्भिर्धर्मशुद्धिमभीप्सुभिः' ।
या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः ।
सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ।।'- ( मनु. १२।९५, सूत. सं. २।१४।१८ )
- विरोधात्ता ना० - पाठान्तरम् । ** भिमतौ ० - पाठान्तरम् ।