उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 364 में से
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हृदयस्पर्शिनी
आत्मा या अन्तःकरण में संस्कार का आधान, बुद्धि (ज्ञान) करेगी कहें, तो संस्कारों के आधानकाल में
बुद्धि के आधारभूत अन्तःकरण या आत्मा की स्थिति ही कहाँ है ? क्योंकि बौद्ध सिद्धान्त में तो सभी क्षणिक माने गये
हैं। तस्मात् बौद्ध मत के अनुसार सदैव स्मृति का अभाव ही रहेगा। प्रत्यभिज्ञा को बौद्धों ने सादृश्यनिबन्धन
भ्रम कहा है, किन्तु उनका यह कहना अनुचित है। इनके मत में बुद्धि का कोई आधार (साक्षी) न होने से पूर्ववर्ती
और उत्तरवर्ती ज्ञान की तुल्यता का भी कोई हेतु नहीं है, अतः वह तुल्यता, निनिमित्त ही है; क्योंकि पूर्वक्षण और
उत्तरक्षणवर्ती दोनों ज्ञानों में सादृश्यनिरूपक कोई नहीं है। सादृश्य के व्यवहार में निमित्त तो गुण या अवयव
हुआ करते हैं, विज्ञान में उनका होना संभव नहीं, क्योंकि विज्ञान तो निर्गुण और निरवयव रहता है। तथा पूर्वोत्तर
क्षणों में किसी एक द्रष्टा के विद्यमान न रहने से सादृश्य कैसे सिद्ध हो सकेगा ? अतः तुल्यता के सिद्ध न हो पाने
से प्रत्यभिज्ञान को तन्निबन्धन अर्थात् सादृश्यनिबन्धन भी नहीं कह सकते। इन सब विपत्तियों से बचने के लिये यदि
पूर्वापरक्षणसादृश्य के किसी स्थायी द्रष्टा का स्वीकार करोगे तो तुम्हारे क्षणिकत्व के सिद्धान्त की हानि होगी,
जो तुम्हें इष्ट नहीं है ॥ २६ ॥
शान्तेश्चायतनसिद्धत्वात्साधनोक्तिरनर्थिका ।
एकैकस्मिन्समाप्तत्वाच्छान्तेरन्यानपेक्षता ॥२७॥
शान्तेश्चेति — बाह्य वस्तुओं के स्थायित्वादि भ्रम की निवृत्ति अनायास हो ही सकती है। अतः उसके
लिये साधन (उपाय) बताना व्यर्थ ही है। विज्ञान की निवृत्ति एक-एक क्षण में (प्रतिक्षण) हो ही जाती है। अतः
उसकी निवृत्ति के लिये किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं है ॥ २७ ॥
हृदयस्पर्शिनी
बौद्धों का जो यह कथन है कि 'सर्वं क्षणिकम् — इस प्रकार क्षणिकत्वादि भावना करते रहने से स्थायित्व-
भ्रम की निवृत्ति (शान्ति) होना ही मुक्ति है', वह भी उचित नहीं है। विषयों (पदार्थों) के स्थायित्वादिभ्रम की
निवृत्ति के लिये किसी प्रकार के प्रयत्न की तुम्हारे मत के अनुसार आवश्यकता नहीं होगी। क्योंकि तुम्हारे मत में
प्रत्येक ज्ञान स्वभावतः ही क्षणिक है, अतः उसके स्थायित्वभ्रम को दूर करने के लिये किसी साधन (उपाय) की
कौन-सी आवश्यकता है ? वह तो स्वयमेव दूसरे क्षण में शान्त (निवृत्त) हो जायेगा। सदृश ज्ञान-सन्तान के लिये
यदि कहो तो 'सदृश ज्ञान-सन्तान' तो कोई वस्तु ही नहीं है। क्योंकि उस सन्तान का कोई स्थिर साक्षी नहीं है।
और एक-एक क्षण में भ्रम का अभाव तो स्वाभाविक ही है, अतः शान्ति (निवृत्ति) रूप मुक्ति के लिये किसी साधन
की अपेक्षा तुम्हारे मत में नहीं होनी चाहिये। अतः बौद्ध मत के अनुसार मुक्ति के लिये साधनानुष्ठान करना या साध-
नोपदेश देना अनुचित ही सिद्ध हो रहा है ॥ २७ ॥
अपेक्षा यदि भिन्नेऽपि परसंतान इष्यताम् ।
सर्वार्थे क्षणिके कस्मिंस्तथाप्यन्यानपेक्षता ॥२८॥
अपेक्षेति — इसके अतिरिक्त बौद्ध मत के अनुसार पदार्थों का कार्य-कारण भाव भी नहीं बन सकता। यदि
यह कहें कि कार्य और कारण में अत्यन्त भेद होने पर भी उनमें सन्तति-क्रम होने के कारण उन्हे एक-दूसरे की अपेक्षा हो
सकती है, तब तो किसी अन्य कार्य-कारण सन्तति में भी अन्य वस्तु की अपेक्षा कहनी होगी। यदि यह कहें कि सब पदार्थ
क्षणिक होने पर भी किसी-किसी में ही किसी विशेष पदार्थ की अपेक्षा होती है, तो यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योंकि
क्षणिक होने के कारण एक पदार्थ को दूसरे पदार्थ की अपेक्षा ही नहीं होगी ॥ २८ ॥
हृदयस्पर्शिनी
किञ्च बौद्ध मत के अनुसार लौकिक साध्य-साधनभाव (कार्य-कारणभाव) भी संगत नहीं हो सकता,
क्योंकि सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक ही हैं। लोकव्यवहार में हम देखते हैं कि दूध से दही हुआ करता है, अर्थात् दही का