उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८६ उपदेशसाहस्री
हृदयस्पर्शिनी
शास्त्र और आचार्य के अनुग्रह से (प्रसाद से) तत्त्वज्ञान हो जानेपर भी श्रेयोमार्ग की प्राप्ति में प्रति-
बन्धक शत्रु की संभावना तो हो ही सकती है, उसके निवारणार्थ कुछ कार्य तो करना ही होगा । यह आशंका हो सकती
है, किन्तु वह ठीक नहीं है, क्योंकि रवि की स्वाभाविक उष्णता को शीतल करना अथवा अग्नि की स्वाभाविक
उष्णता को शीतल करना जैसे संभव नहीं अर्थात् उष्ण स्वभाव वाले अग्नि को जैसे शीत स्वभाव का नहीं बनाया जा
सकता, उसी प्रकार आत्मवित् की दृष्टि में अपना कोई शत्रु दिखाई देना सर्वथा असंभव है। क्योंकि समस्त प्राणियों
में वह आत्मवित् अपने को ही देखता रहता है, अतः उसमें शत्रु-मित्रादि की भावना का होना संभव ही नहीं है ।
इसलिये उसमें कार्यशेषता नहीं बन पाती ॥ ३२ ॥
प्रज्ञाप्राणानुकार्यात्मा छायेवाक्षादिगोचरः ।
ध्यायतीवेति चोक्तो हि शुद्धो मुक्तः स्वतो हि सः ॥३३॥
प्रज्ञेति—यह आत्मा, बुद्धि और प्राण का अनुकरण करता रहता है। बुद्धि में प्रतिबिम्बित हुआ वह आत्मा
सूर्य के प्रतिबिम्ब के समान इन्द्रिय आदि का विषय होता है। बुद्धि जब किसी विषय का ध्यान करती है, तब वही
(आत्मा ही) ध्यान करता-सा प्रतीत होता है। इसी बात को भगवती श्रुति भी कह रही है—'आत्मा मानो ध्यान करता है' १
किन्तु वस्तुतः उस आत्मा में कोई क्रिया अथवा विकार नहीं है, वह तो सर्वदा शुद्ध और मुक्त ही है ॥ ३३ ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा में कार्यशेषता समझनेवाले से हम पूछते हैं कि पहले यह बताओ कि कार्यशेषता सोपाधिक आत्मा
में समझते हो या निरुपाधिक आत्मा में ? सोपाधिक आत्मा में यदि कार्यशेषता कहो तो उसे हम भी कहते हैं। किन्तु
यदि निरुपाधिक आत्मा की कार्यशेषता कहो, तो वह ठीक नहीं है। क्योंकि आत्मा, बुद्धि और प्राण का अनुकरण करता
है। वह सूर्यादि के प्रतिबिम्ब के समान इन्द्रिय आदि का विषय होता है। अर्थात् जिस प्रकार सूर्य आदि का प्रतिबिम्ब
जल आदि में गिरने से उनकी चञ्चलता के कारण चलायमान-सा दिखाई देता है, उसी प्रकार बुद्धि आदि में
प्रतिबिम्बित हुआ आत्मा, उन बुद्धि आदि के ध्यान करने पर ध्यान करता-सा जान पड़ता है,१ किन्तु वास्तव में उसमें
कोई क्रिया या विकार नहीं है, वह तो सर्वदा शुद्ध और मुक्त ही है ॥ ३३ ॥
अप्राणस्याऽमनस्कस्य तथाऽसंसर्गिणो दृशेः ।
व्योमवद्व्यापिनो ह्यस्य कथं कार्यं भवेन्मम ॥३४॥
अप्राणस्येति—प्राणहीन, मनोहिन, असंसारी और आकाश के समान व्यापक मुझ साक्षी को किसी प्रकार
का कोई कर्तव्य कैसे हो सकता है ? ॥ ३४ ॥
हृदयस्पर्शिनी
निरुपाधिक आत्मा में कार्यशेषता तो है ही नहीं, उसी तरह 'प्राणायामान् षडाचरेत्'२ इत्यादि यतिधर्म-
विधिशेषता भी उसमें नहीं है। क्रियाशक्तिवाले प्राण से हीन, ज्ञानशक्तिवाले मन से हीन, स्वभावतः ही असंग
(असंसारी), आकाश के समान व्यापक (अपरिच्छिन्न) अर्थात् स्वतः चलनशक्ति से रहित, चिदेकरस (साक्षी) स्वरूप
मेरे लिये कोई कर्तव्य कैसे संभव हो सकता है ? तस्मात् मुझ निरुपाधिक में किसी प्रकार की कोई कार्यशेषता
नहीं है ॥ ३४ ॥
असमाधिं न पश्यामि निर्विकारस्य सर्वदा ।
ब्रह्मणो मे विशुद्धस्य शोध्यं नान्यद्विपाप्मनः ॥३५॥
असमाधिमिति—मैं निर्विकार विशुद्ध ब्रह्मस्वरूप हूँ, मुझे कभी कोई विक्षेप (विकार) नहीं दिखाई देता,
तथा मैं सर्वथा और सर्वदा निष्पाप हूँ, अतः कुछ शोधन करने योग्य भी मैं नहीं समझता ॥ ३५ ॥
१. 'ध्यायतीव लेलायतीव'—(बृ. उ. ४।३।७)
२. (मनु. ६।६९)