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सर्वकोश
उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)

Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा

स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished364 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 364 में से

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पृष्ठ 109

चाहिये। इस आशंका के समाधान में यह कहा जाता है कि जो पुरुष, आत्मा को कर्ता, भोक्ता, प्रमाता समझता है, वह
वास्तव में आत्मवित् (आत्मज्ञानी) ही नहीं है। आत्मवित् तो उसे कहते हैं, जो आत्मा को अकर्ता, अज्ञाता, अभोक्ता
समझता है। अर्थात् जो उसे कर्ता, ज्ञाता, भोक्ता का साक्षी समझता है, उस पुरुष को ही आत्मवित् समझना
चाहिये ॥ २४ ॥

यथान्यत्वेऽपि तादात्म्यं देहादिष्वात्मनो मतम् ।
तथाऽकर्तुरविज्ञानात्फलकर्मार्कर्मताऽऽत्मनः ॥ २५॥

यथेति—जिस प्रकार 'आत्मा' वस्तुतः देहादि से पृथक् (भिन्न) है, फिर भी अज्ञानवश देहादि के साथ
'आत्मा' का तादात्म्य (एकरूपता) समझा जाता है, उसी प्रकार अकर्ता-अभोक्ता आत्मा में अज्ञान से ही क्रियाफल की
कर्मता मानी जाती है ॥ २५ ॥

हृदयस्पशिनी
यदि आत्मा अहंकार से अतिरिक्त है तो उस आत्मा में कर्तृत्व, भोक्तृत्व की प्रसिद्धि क्यों है ? अर्थात्
आत्मा को कर्ता, भोक्ता समझनेवाला पुरुष 'आत्मवित्' क्यों नहीं है ? क्योंकि कर्तृत्वादि का प्रतिभास तो आत्मा में ही
होता है। इस आशंका का समाधान यह है कि आत्मा की अकर्तृता, अभोक्तृता का परिज्ञान न होने के कारण
उसमें अहंकार का अध्यास होता रहता है, उससे कर्तृता-भोक्तृता का ज्ञान होता है। वस्तुतः आत्मा तो देहादि से
भिन्न है तथापि अज्ञानवश देहादि के साथ आत्मा का तादात्म्य माना जाता है। उसी प्रकार अकर्ता, अभोक्ता जो आत्मा
है, उसमें अज्ञान से ही क्रियाफल की कर्मता मानी गई है। जैसे स्थूल देह और आत्मा के अभेदाध्यास से मनुष्यत्वादि का
अभिमान होता है, उसी तरह अहंकारप्रधान लिंगदेह और आत्मा का अभेदाध्यास (अविवेक) रहने से आत्मा में
कर्तृत्वादि का अभिमान (मिथ्याबुद्धि) होता रहता है ॥ २५ ॥

दृष्टिः श्रुतिर्मतिर्ज्ञातिः स्वप्ने दृष्टा जनैः सदा ।
तासामात्मस्वरूपत्वादतः प्रत्यक्षताऽऽत्मनः ॥२६॥

दृष्टिरिति—स्वप्नावस्था में मनुष्य सर्वदा ही दर्शन, श्रवण, मनन एवं ज्ञान का अनुभव करता है, क्योंकि
ये सभी आत्मस्वरूप ही हैं। इस अनुभव से आत्मा का प्रत्यक्ष सिद्ध होता है। अर्थात् जिसे 'प्रत्यक्ष' शब्द से कहा जाता
है, वह 'ज्ञान' ही है, और 'ज्ञेय' पदार्थ जो हैं, वह तो 'ज्ञान' की उपाधिमात्र हैं, और 'ज्ञान' ही आत्मा का
स्वरूप है ॥ २६ ॥

हृदयस्पशिनी
पुनरपि शंका होती है कि अहंकार ही तो आत्मा है, तब यह कैसे कहा जा रहा है कि अहंकार और
आत्मा में विवेक न होने से आत्मा में कर्तृत्वादि का भ्रम होता है ? इसका उत्तर यह है कि अन्तःकरण के सहित दृष्टि
आदि जो हैं, वे सब साक्षिवेद्य हैं। इससे यह स्पष्ट हुआ कि साक्षी, उनसे भिन्न है। पद्य में दृष्टि, श्रुति, मति, ज्ञाति
शब्दों से चक्षुरादिद्वारक अन्तःकरणवृत्तियों का निर्देश किया गया है। स्वप्नावस्था में सर्वदा ही मनुष्य दर्शन, श्रवण,
मनन तथा ज्ञान का अनुभव करता है। स्वप्न में सवृत्तिक अन्तःकरण वेद्याकार होता है। अतः उनका वेदिता (ज्ञाता)
कोई अन्य है, जिसे साक्षी कहते हैं—यह सिद्ध हुआ। इससे आत्मा की अपरोक्षता (प्रत्यक्षता) सिद्ध होती है। दूसरी
बात यह है कि दृष्टि आदि सब आत्मस्वरूप ही हैं। अभिप्राय यह है कि सुषुप्ति में सवृत्तिक अन्तःकरण तो अविद्या-
मात्र होने से आत्मा में उसका अस्त (लय) हो जाता है, और आत्मा तो कहीं अस्त (लीन) होता नहीं। वह तो स्वयं
अद्वय, अपरोक्ष, चिन्मात्ररूप है, अर्थात् 'ज्ञान' ही एकमात्र उसका स्वरूप है। प्रत्यक्ष होनेवाला एकमात्र केवल 'ज्ञान'
ही है। ज्ञेय पदार्थ तो उसकी (ज्ञान की) उपाधियां हैं। अतः अहंकारादि स्वरूपवाले अन्तःकरण से आत्मा को पृथक्
समझना उचित ही है ॥ २६ ॥