उपदेशसाहस्री (श्रीमच्छङ्करभगवत्पाद विरचिता - 'हृदयस्पर्शिनी' हिन्दी टीका सहित)
Upadesha Sahasri with Hridayasparshini Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य / पं. गजानन शास्त्री मुसलगांवकर द्वारा
स्रोत: महेश अनुसन्धान संस्थान माउंट आबू · महेश अनुसन्धान संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वप्नस्मृतिप्रकरणम् ७७
है। उसका भेद किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं हो पा रहा है। भेद भी साक्ष्य है, अतः उसमें साक्षी के धर्म का अभाव
है, इन कारण साक्षी आत्मा में भेद की शंका करने का कोई अवकाश ही नहीं है ॥ ७ ॥
करणं कर्म कर्ता च क्रिया स्वप्ने फलं च धीः ।
जाग्रत्येवं यतो दृष्टा द्रष्टा तस्मात्ततोऽन्यथा ॥८॥
करणमिति—जिस प्रकार स्वप्नावस्था में करण, कर्म, कर्ता और फल ये सब बुद्धिमात्र ही हैं, उसी प्रकार
ये सब जाग्रदवस्था में भी हैं। क्योंकि ये सब दृष्ट हैं। अतः इन सबसे द्रष्टा पृथक् (भिन्न) है ॥ ८ ॥
हृदयस्पर्शिनो
यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि यद्यपि सर्वत्र चैतन्य एक है तथापि बुद्धि आदि दृश्य पदार्थ तो अनेक हैं,
ऐसी स्थिति में अद्वय ब्रह्मात्मता की सिद्धि कैसे हो सकती है? इसका समाधान यह है कि क्रिया-कारक फलात्मक
सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च, अनादि, अनिर्वाच्य अविद्याविजृंभितमात्र है अर्थात् अविद्याविलासबुद्धिमात्र है। उस कारण
चैतन्य (चेतन) की अद्वय ब्रह्मता के साथ कोई विरोध नहीं है। जैसे स्वप्न में बुद्धि ही क्रिया-कारक-फल का रूप
धारण कर लेती है, क्योंकि उस समय बाह्य पदार्थ का अभाव निश्चित है, उसी प्रकार जाग्रदवस्था में जबकि बुद्धि ही
क्रिया-कारक-फल के रूप में देखी गई है और उसी के द्वारा बाह्य पदार्थ की सत्ता का ज्ञान हुआ है। उसी कारण
सुषुप्ति में भी तदाकारविशेष का स्फुरण कदाचित् हो सकता है। इसलिए आत्मा में विषयों के साथ ही बुद्धि, अध्यस्त
होने के कारण और उस बुद्धि का आदि तथा अन्त होने के कारण उसे मिथ्या कहा जाता है। इस विवेचन से यह
प्रतीत होता है कि द्रष्टा आत्मा, उस मिथ्या बुद्धि से अन्यादृश ही है, अर्थात् सत्य अखण्डैकरस है, वह बुद्धि का साक्षी
है, क्रिया-कारक-फल से वह विलक्षण है। इस रीति से साक्षी में ब्रह्मता सिद्ध होती है ॥ ८ ॥
बुद्ध्यादीनामनात्मत्वं हेयोपादेयरूपतः ।
हानोपादानकर्ताऽऽत्मा न त्याज्यो न च गृह्यते ॥९॥
बुद्ध्यादीनामिति—हेय (त्याज्य) और उपादेय (ग्राह्य) होने के कारण बुद्धि आदि पदार्थ अनात्मरूप हैं, किन्तु
इनका त्याग और स्वीकार (ग्रहण) करने वाला आत्मा है, क्योंकि वह बुद्धि आदि पदार्थों का अधिष्ठान है। न तो उसे त्यागा
जाता है और न उसे ग्रहण ही किया जाता है ॥ ९ ॥
हृदयस्पर्शिनी
पूर्व श्लोक में बुद्धि आदि पदार्थों के साक्षी आत्मा को अन्यादृश बताया था, उसे ही इस पद्य के द्वारा
स्पष्ट कर रहे हैं। वस्त्र की तरह आगमापायी होने से बुद्धि आदि, अनात्मस्वरूप धर्म है। अनात्म पदार्थ की तरह
चिदात्मा में आगमापायित्व की आशंका नहीं कर सकते, क्योंकि बुद्धि आदि अनात्म पदार्थों के हान (लय) और
उपादान (विक्षेप) का कर्ता वही चिदात्मा है। अनात्म पदार्थों का अधिष्ठान होनेमात्र से उसे कर्ता कहा जाता है।
न वह किसी के द्वारा त्याज्य यानी विलयन करनेयोग्य है और न ग्रहण किया जाता है, क्योंकि वह तो सर्वाधिष्ठान
है, उसका कोई अन्य अधिष्ठान नहीं है ॥ ९ ॥
सबाह्याभ्यन्तरे शुद्धे प्रज्ञानैकरसे घने ।
बाह्यमाभ्यन्तरं चान्यत्कथं हेयं प्रकल्प्यते ॥१०॥
सबाह्येति—जो आत्मा बाहर भी है और भीतर भी है अर्थात् सर्वत्र व्याप्त है, जो शुद्ध है, एकमात्र ज्ञान-
रूप है और निरवकाश है, ऐसे उस आत्मा में बाह्य या आभ्यन्तर किसी अन्य हेय या ग्राह्य की कल्पना कैसे की जा
सकती है? ॥ १० ॥
हृदयस्पर्शिनी
आत्मा स्वरूपतः अहेय-अनुपादेय है तथापि तत्संबंधित्वेन प्राप्त होने वाले बाह्य वस्त्र-आभरणादि
पदार्थ, और आभ्यन्तर पाप आदि मलों की हेयता तथा आभ्यन्तर योग-ध्यान-धारणा आदि की उपादेयता तो बनी ही