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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
तदा तस्याः प्रीतये स भोगाहरणतत्परः ।
तेनानीतं बह्वपि च भक्षयित्वा क्षणमात्रतः ॥ ८४ ॥
पुनर्बुभुक्षयाक्रान्ता भोगाहरणहेतवे ।
सदा प्रियं सन्दिशति सोऽप्याहर्तुं सदेक्षते ॥ ८५ ॥
पुत्रैः पञ्चभिरानीतं प्रियेणापि सुसंभृतम् ।
भुक्त्वा क्षणेन भूयोऽपि सा बुभुक्षाप्रपीडिता ॥ ८६ ॥
भोगाहृतौ सन्दिशति प्रियं पुत्रांश्च सर्वदा ।
ततः सा स्वल्पकालेन सुषुवे पुत्रयोर्युगम् ॥ ८७ ॥
ज्वालामुखस्तयोर्ज्येष्ठो निन्द्यवृत्तस्तथापरः ।
सदा मातुः प्रियतमौ तौ पुत्रौ संबभूवतुः ॥ ८८ ॥
महाशनाने उस अस्थिरको अपने मनोऽनुकूल देखकर पतिरूपसे वरण
कर लिया ॥ ८२-८३ पू० ॥
अस्थिरकी भी अब उसमें अत्यन्त आसक्ति हो गयी और वह
उसकी प्रसन्नताके लिये सर्वदा तरह-तरहके भोग लानेमें तत्पर रहने
लगा ॥ ८३ उ०-८४ पू० ॥
वह जो कुछ लाता उसे क्षणमात्रमें ही चट करके वह पुनः भोगा-
कांक्षासे व्याकुल हो जाती और अपने प्रियतमको सर्वदा नये-नये
भोग लानेके लिये प्रेरित करती रहती । तथा वह भी सदा उन्हें लाने
की ही ताकमें लगा रहता ॥ ८४ उ०-८५ ॥
पाँचों पुत्र तरह-तरहके भोग लाते और पति भी खूब पेट भरता
रहता । किन्तु महाशना एक क्षणमें सबको स्वाहा करके भूखसे
व्याकुल ही बनी रहती ॥ ८६ ॥
वह सर्वदा अपने प्रेमी और पुत्रोंको भोग लानेमें ही जोतती
रहती । फिर कुछ समयमें ही उसके दो पुत्र हुए ॥ ८७ ॥
उनमें बड़ा था ज्वालामुख² और छोटा था निन्द्यवृत्त³ । वे दोनों पुत्र
अपनी माँके बड़े ही लाड़िले थे ॥ ८८ ॥
१. आशा; विषयभोगोंसे कभी तृप्त न होनेके कारण इसे 'महाशना' कहा है ।
२. क्रोध । ३. लोभ ।