त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः । ६३
गृह्णात्याश्चर्यजननं प्रियमेवं स्वके वशे।
चक्रे सात्यन्तनिपुणा स्वनैपुण्यवशात् खलु ॥ ५१॥
अस्थिरोऽपि क्षणेनैव त्वसंख्यशतयोजनम् ।
प्रयात्यायाति च सदा न श्रान्तिमुपगच्छति ॥ ५२ ॥
समीहते यत्र गन्तुमस्थिरश्च यदा यदा ।
तस्येष्टं स्वस्वरूपन्तु कृत्वा सा चपलापि हि ॥ ५३ ॥
तत्र तत्र स्थिता भूत्वा रमयत्येव स्वं प्रियम् ।
एवं सा चपला सम्यगस्थिरेण युता सती ॥ ५४ ॥
सुषुवे पञ्चतनयान् मातापितृपरायणान् ।
ते समर्थाः पञ्चविधा मयि सख्या निवेशिताः ॥ ५५ ॥
अहं सख्यनुरक्ता तानकुर्वं बलवत्तरान् ।
अथ ते पञ्चतनयाश्चपलायाः पृथक् पृथक् ॥ ५६ ॥
लेती थी। वह बड़ी ही चतुर थी। उसने अपनी चतुरतासे अपने प्रेमीको
अपने अधीन कर लिया ॥ ५०-५१ ॥
अस्थिर भी एक क्षणमें ही असंख्य शत (करोड़ों) योजन आ-जा
सकता था। इससे थकता तो वह कभी था ही नहीं ॥ ५२ ॥
अस्थिर जब-जब भी जहाँ कहीं जानेका विचार करता, चपला भी
वहीं-वहीं पहुँचकर उसकी रुचिके अनुसार अपना रूप बनाकर अपने
प्रियतमका मनोरञ्जन करती ॥ ५३-५४ पू० ॥
इस प्रकार अस्थिरके सम्पर्कमें रहते हुए चपलाने पाँच पुत्र¹उत्पन्न
किये। वे अपने माता-पिताके बड़े अनुगत थे।² वे बड़े समर्थ थे
और पाँचों पाँच प्रकारके थे। मेरी सखीने उन्हें मुझे ही सौंप
दिया³ ॥ ५४ उ०-५५ ॥
सखीके अनुरागवश मैंने उन्हें और भी बलवान् बना दिया। फिर
चपलाके उन पाँच पुत्रोंने अपने लिये अलग-अलग बड़े विचित्र,
१. पाँच कर्मेन्द्रियाँ।
२. क्योंकि इन्द्रियवर्ग मनकी कल्पना-शक्तिको बढ़ानेमें सहायक होते हैं।
३. अर्थात् उनका भी चेतन जीवात्मासे तादात्म्य हो गया।