त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः । ६१
पितुर्मौढ्येन संयुक्तः पितामह्या गुणेन च ॥ ३९ ॥
अनेकचित्रनिर्माणसामर्थ्येन समावृतः ।
पितामह्या शून्यनाम्न्या पित्रा मूढाभिधेन च ॥ ४० ॥
अस्थिराह्वः शिक्षितोऽभूत् स्वयं चातिविशारदः ।
गतिमप्रतिबद्धां वै शीघ्राच्छीघ्रां समासदत् ॥ ४१ ॥
एवं मम सखी स्वच्छस्वभावा जन्मतः सती ।
असतीसङ्गतोऽत्यन्तं मालिन्यं समुपागता ॥ ४२ ॥
सख्या प्रियेण पुत्रेणासत्स्वभावयुतेन सा ।
चिरसङ्गात्तेषु दृढानुरागेण समायुता ॥ ४३ ॥
जहौ मय्यनुरागन्तु सर्वथा क्रमशः सखी ।
अहं स्वभावसरला हातुं तत्सङ्गमञ्जसा ॥ ४४ ॥
चंचल था । तथा वह अपने पिताकी मूढतासे और दादीके गुणसे
भी सम्पन्न था¹ ॥ ३६ ॥
उसमें अनेक प्रकारके चित्र बनानेका सामर्थ्य भी आ गया । फिर
शून्य² नामवाली दादी और मूढ नामवाले पिताने अपने उन अस्थिर
नामक पुत्रको, जो स्वयं भी बहुत कुशल था, पढ़ा-लिखाकर पक्का कर
दिया । इससे उसे शीघ्रातिशीघ्र ऐसी गति प्राप्त हो गयी जो किसीके
द्वारा भी रोकी नहीं जा सकती थी ॥ ४०-४१ ॥
इस प्रकार मेरी सखी, जो बड़े निर्मल स्वभाववाली और जन्मसे
सती ही थी, उस असतीका संग पाकर अत्यन्त मलिनताको प्राप्त हो
गयी³ ॥ ४२ ॥
अपने असत्स्वभाव प्रेमी और पुत्रका चिरकालतक संग रहनेसे
उसका उन्हींमें दृढ अनुराग हो गया ॥ ४३ ॥
अतः क्रमशः मेरी सखीने मुझसे प्रेम करना छोड़ दिया । किन्तु मैं
सरल स्वभावकी थी, इसलिये सहसा अपनी सखीका संग छोड़ने में
१. मनमें अपने पिता मोहका गुण जड़ता और अपनी दादी अविद्याका गुण
विचित्र सृष्टि-रचना रहते ही हैं ।
२. वास्तव मेंअविद्याकी कोई सत्ता नहीं है, इसलिये उसे शून्य कहा गया है ।
३. शुद्ध सत्त्वमयी होनेपर भी अविद्याके अधीन होनेपर रजोगुण-तमोगुण-
विशिष्ट हो गयी ।