त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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अखण्डाद्वयचिच्छक्तिस्त्रिपुरैवावभासिनी ।
सैवाविद्या च विद्या च बन्धो मोक्षश्च साधनम् ॥ १०५ ॥
एतावदेव विज्ञेयं नान्यद्भार्गव विद्यते ।
एतत्तेऽभिहितं राम विज्ञानक्रममादितः ॥ १०६ ॥
एतत् सुविज्ञाय जनो भूयः क्वापि न शोचति ।
नारदैष ज्ञानखण्डः सूपपत्त्युपलब्धिकः ॥ १०७ ॥
श्रुतो न नाशयेत् कस्य मोहमज्ञानसम्भवम् ।
श्रुत्वाप्येतद्यस्य मोहो न शान्तिं प्राप्नुयात् क्वचित् ॥ १०८ ॥
स शैलपुरुषो लोके केन ज्ञानं पुनर्भवेत् ।
सकृदेव श्रुतं ह्येतद्विज्ञानं जनयेद् दृढम् ॥ १०९ ॥
द्विधा त्रिधा वा मन्दस्य ज्ञानं न जनयेत् कथम् ।
एतत् पापौघशमनं श्रुतं विज्ञानदं मतम् ॥ ११० ॥
अखण्ड अद्वयस्वरूपा चित्-शक्ति ही प्रकाशित हो रही है। वही
अविद्या और विद्या है तथा वही बन्ध, मोक्ष और साधन भी
है ॥ १०४ उ०-१०५ ॥
भृगुनन्दन ! बस, इतनी बात ही जानने योग्य है, और कुछ
नहीं। परशुराम ! इस प्रकार आरम्भसे ही यह मैंने तुम्हें ज्ञानप्राप्तिका
क्रम सुना दिया। इसे अच्छी तरहसे समझ लेनेपर पुरुषको फिर
किसी प्रकारका शोक नहीं होता ॥ १०६-१०७ पू० ॥
[श्रीहारितायन मुनि कहते हैं—] नारद ! यह ज्ञानखण्ड सम्यक्
प्रकारसे युक्ति और अनुभवसे पूर्ण है। यदि इसका श्रवण किया
जाय तो ऐसा कौन है जिसके अज्ञानजनित मोहको यह दूर न
करे ॥ १०७ उ०-१०८ पू० ॥
इसे सुनकर भी जिसका मोह शान्त न हो वह तो इस
लोकमें पत्थरकी मूर्ति ही है, उसे फिर और किसके द्वारा ज्ञान
होगा ? ॥ १०८ उ०-१०९ पू० ॥
यह तो एक बार श्रवण करनेपर ही दृढ ज्ञान उत्पन्न कर देता
है। फिर जो मन्दबुद्धि है उसे भी दो-तीन बार सुननेपर कैसे
ज्ञान उत्पन्न नहीं करेगा ? ॥ १०९ उ०-११० पू० ॥
यह ग्रन्थ श्रवण करनेपर पापराशिको शान्त करनेवाला और विशुद्ध