त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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कालेन पाचितप्रायं पक्वं कर्म समीरितम् ॥ ३० ॥
अपाचितमपक्वं स्याज्ज्ञानोत्पत्तेरनन्तरम् ।
कृतं हतोदितं विद्धि ज्ञानाद्धतसमुद्भवात् ॥ ३१ ॥
तत्र पक्वं तु यत् कर्म तदारब्धमितीर्यते ।
आवेगं मुक्तशरवत्तिष्ठत्येव फलप्रदम् ॥ ३२ ॥
तन्मूलको जगद्भासो ज्ञानस्य तारतम्यतः ।
स्थितोऽपि भ्रान्तितुल्योपि न भ्रान्तिः फलभेदतः ॥ ३३ ॥
जनयेत्तत्कालफलं मन्दज्ञानवतां स्फुटम् ।
मध्यानामस्फुटं तच्च ज्ञानिनां फलभासनम् ॥ ३४ ॥
उत्तमानान्तु तत्कालफलञ्च स्पष्टभासनम् ।
शशशृङ्गसमं ब्रह्मन् न हि तत्फलमुच्यते ॥ ३५ ॥
अज्ञानिनां कर्मफलं पुष्टं पूर्णानुसन्धितः ।
किया है। जो कर्म कालके द्वारा प्रायः परिपक्व (फलोन्मुख) कर
दिये जाते हैं वे 'पक्व' कर्म कहे गये हैं ॥ ३० ॥
जो परिपक्व नहीं हुए हैं वे 'अपक्व' हैं और जो ज्ञानोत्पत्तिके
पीछे किये जाते हैं उन्हें 'हतोदित' समझो, क्योंकि वे ज्ञानसे हत
हुए ही उत्पन्न होते हैं ॥ ३१ ॥
इनमें जो पक्व कर्म हैं वे प्रारब्ध कहलाते हैं। वे छोड़े हुए
बाणके समान अपना वेग रहनेतक फल प्रदान करते ही हैं ॥ ३२ ॥
ज्ञानकी न्यूनाधिकताके अनुसार उन्हींके कारण जगत्की प्रतीति
बनी रहती है। वह जगत्प्रतीति भ्रान्तिके समान होनेपर भी फलमें
भेद रहनेके कारण भ्रान्ति नहीं है ॥ ३३ ॥
मन्द ज्ञानियोंको यह प्रारब्ध तत्काल स्पष्ट फल प्रदान करता
है। और मध्यम ज्ञानियोंको वह फलका भास अस्पष्ट होता है ॥ ३४ ॥
उत्तम ज्ञानियोंको फलका भास तत्काल एवं स्पष्ट तो होता है, किन्तु
ब्रह्मन् ! उनकी दृष्टिमें वह शशशृंगके समान असत् होनेके कारण फल
कहा नहीं जाता ॥ ३५ ॥
अज्ञानियोंको तो कर्मफलका अनुसन्धान पहले हीसे बना रहता है,