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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 404 में से

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पृष्ठ 343

एकविंशतितमोऽध्यायः
श्रुत्वेत्थं भार्गवो रामो दत्तात्रेयमुनेरितम् ।
अविद्याजालविभ्रान्तेर्मुक्तप्रायो बभूव ह ॥ १ ॥
पुनः पप्रच्छाऽत्रिसुतं किञ्चिन्नत्वा सुभक्तितः ।
भगवन् ब्रूहि विज्ञानसाधनं सुनिश्चितम् ॥ २ ॥
सारभूतञ्च सुलभं यत् साक्षात् फलदायकम् ।
ज्ञानिनां लक्षणञ्चापि येन ज्ञास्यामि तान् द्रुतम् ॥ ३ ॥
ज्ञानिनां देहसंयोगे वियोगे च स्थितिं यथा ।
व्यवहारं कुर्वतां चाप्यनासक्तं मनः कथम् ॥ ४ ॥
एतत् सर्वं सुकृपया स्पष्टं मे वक्तुमर्हसि ।
एवमत्रिसुतः पृष्टो जमदग्निसुतेन वै ॥ ५ ॥
सन्तुष्टः प्राह करुणासिन्धुः सम्बोध्य भार्गवम् ।
शृणु राम प्रवक्ष्यामि रहस्यं ज्ञानसाधनम् ॥ ६ ॥
एकविंशतितमोऽध्यायः ॥ २१ ॥
ज्ञानके मुख्य साधन, ज्ञानियोंके लक्षण तथा हेमाङ्गद और ब्रह्मराक्षसका संवाद
इस प्रकार भृगुनन्दन परशुराम दत्तात्रेयजीका उपदेश सुनकर अवि-
द्याजालरूप भ्रमसे प्रायः मुक्त हो गये ॥ १ ॥
फिर अत्यन्त भक्तिपूर्वक नमस्कार कर उन्होंने अत्रिनन्दन दत्ता-
त्रेयजीसे इस प्रकार कुछ प्रश्न किया, "भगवन् ! ज्ञानप्राप्तिके
अत्यन्त निश्चित और सारभूत साधन बताइये, जो सुलभ भी हों और
साक्षात् मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाले हों । साथ ही ज्ञानियों के
लक्षण भी बतलाइये, जिनसे मैं उन्हें तत्काल पहचान सकूँ ॥ २-३ ॥
देहका अनुसन्धान रहने और न रहनेके समय उनकी जैसी
स्थिति रहती है तथा व्यवहार करते समय भी किस प्रकार उनका
मन उसमें आसक्त नहीं होता—कृपया ये सभी बातें मुझे स्पष्टतया
बतलाइये" ॥ ४-५ पू० ॥
परशुरामके इस प्रकार प्रश्न करनेपर करुणासागर दत्तात्रेयजी
बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें सम्बोधन करके कहने लगे—"परशुराम !
सुनो, मैं तुम्हें ज्ञानके गुप्त साधन बतलाता हूँ ॥ ५ उ०-६ ॥