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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 341

विंशोऽध्यायः । ३२७
निर्भयो व्यवहारेषु स सिद्धेषूत्तमो मतः ।
सर्वं सुखञ्च दुःखञ्च व्यवहारञ्च जागतम् ॥ १३० ॥
स्वात्मन्येवाभिजानाति स सिद्धेषूत्तमो मतः ।
अत्यन्तं बद्धमात्मानं मुक्तञ्चापि प्रपश्यति ॥ १३१ ॥
यः स्वात्मनि तु सर्वात्मा स सिद्धेषूत्तमो मतः ।
यः पश्यन् बन्धजालानि सर्वदा स्वात्मनि स्फुटम् ॥ १३२ ॥
मोक्षं नापेक्षते क्वापि स सिद्धेषूत्तमो मतः ।
सिद्धोत्तमोऽहमेवेह न भेदस्त्वावयोः क्वचित् ॥ १३३ ॥
एतद्वो ऋषयः प्रोक्तं सुस्पष्टमनुयुक्त्या ।
एतन्मयोक्तं विज्ञाय न क्वचित् परिमुह्यते ॥ १३४ ॥
इत्युक्ता सा परा विद्या विरराम भृगूद्वह ।
श्रुत्वैतदृषयः सर्वे सन्देहमपहाय च ॥ १३५ ॥
हारमें किसी प्रकारका भय नहीं है वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया
है ॥ १२६ उ०-१३० पू० ॥
जो सम्पूर्ण सुख, दुःख और संसारके व्यवहारको अपने आत्मा-
में ही भासमान समझता है वह सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया
है ॥ १३० उ०-१३१ पू० ॥
जो अत्यन्त बद्ध और मुक्त पुरुषको भी अपने स्वरूपमें ही देखता
है वह सर्वात्मा सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १३१ उ०-१३२ पू० ॥
जो सम्पूर्ण बन्धनोंको भी सर्वदा स्पष्टतया अपने आत्मस्वरूपमें
ही भासमान देखनेके कारण कभी मोक्षकी भी इच्छा नहीं करता वह
सिद्धोंमें श्रेष्ठ माना गया है ॥ १३२ उ०-१३३ पू० ॥
अधिक क्या वह श्रेष्ठ सिद्ध मैं ही हूँ। मेरा और उसका कभी
कोई अन्तर नहीं है। ऋषियो ! यह मैंने तुम्हारे प्रश्नोंका स्पष्ट
उत्तर दे दिया। मेरे इस कथन को ठीक-ठीक समझ लेनेपर फिर मोह
नहीं होता ॥ १३३ उ०-१३४ ॥
भृगुनन्दन ! ऐसा कहकर वह परा विद्या मौन हो गयी। उसका
उपदेश सुनकर सभी ऋषियोंका सन्देह दूर हो गया तथा वे