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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 333

विशोऽध्यायः। ३१६
अपूर्णे तत्परत्वे तु किं सहस्रसुसाधनैः ।
तस्मात्तात्पर्यमेव स्यान्मुख्यं मोक्षस्य साधनम् ॥ ७९ ॥
तात्पर्यं सर्वथैतत्तु साधयामीति संस्थितिः ।
यस्तात्पर्येण संयुक्तः सर्वथा मुक्त एव सः ॥ ८० ॥
दिनैर्मासैर्वत्सरैर्वा मुक्तः स्याद्वाऽन्यजन्मनि ।
बुद्धिनैर्मल्यभेदेन चिरशीघ्रव्यवस्थितिः ॥ ८१ ॥
बुद्धौ तु बहवो दोषाः सन्ति सर्वार्थनाशनाः ।
यैर्जनाः सततन्त्वेवं पच्यन्ते घोरसंसृतौ ॥ ८२ ॥
तत्राद्यः स्यादनाश्वासो द्वितीयः कामवासना ।
तृतीयो जाड्यता प्रोक्ता त्रिधैवं दोषसंग्रहः ॥ ८३ ॥
द्विविधः स्यादनाश्वासः संशयश्च विपर्ययः ।
मोक्षोऽस्ति नास्ति वेत्याद्यः संशयः समुदाहृतः ॥ ८४ ॥
यदि तत्परता पूरी न हो तो अन्य हजारों साधनोंसे भी क्या
लाभ ? अतः तत्परता ही मोक्षका मुख्य साधन है ॥ ७९ ॥
‘जैसे भी होगा इस कार्यको अवश्य पूर्ण करूँगा’ इस स्थितिका
नाम ही तत्परता है। जो तत्परतासे युक्त है वह तो सब प्रकार मुक्त
ही है ॥ ८० ॥
वह कुछ दिनोंमें, महीनोंमें, वर्षोंमें अथवा दूसरे जन्ममें
मुक्त हो ही जायगा। बुद्धिकी निर्मलताके भेदसे ही उसके शीघ्र या
देरीसे मुक्त होनेकी व्यवस्था समझनी चाहिये ॥ ८१ ॥
बुद्धिमें तो सब प्रकारके पुरुषार्थको विफल कर देनेवाले अनेकों
दोष होते हैं, जिनके कारण लोग निरन्तर इसी तरह जन्ममरण-
रूप भयंकर संसाराग्निमें जलते रहते हैं ॥ ८२ ॥
उनमें पहला दोष है अनाश्वास (अविश्वास), दूसरी है काम-
वासना और तीसरी है जडता। इस प्रकार संक्षेपसे तीन प्रकारके
दोष हैं ॥ ८३ ॥
अनाश्वास दो प्रकारका है—संशय और विपर्यय। मोक्ष है भी
या नहीं—यह पहला संशय दोष कहा गया है ॥ ८४ ॥