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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 404 में से

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पृष्ठ 324

३१० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
मत्पराणां हि केषाञ्चिन्न हीयेताऽभिवाञ्छितम् ॥ २० ॥
इति श्रुत्वा परां वाणीं प्रणेमुर्मुनिपुङ्गवाः ।
ब्रह्मादयोऽपि तदनु तुष्टुवुर्विविधैः स्तवैः ॥ २१ ॥
अथ प्रोचुर्ऋषिगणा विद्यां तां त्रिपुरेश्वरीम् ।
नमस्तुभ्यं महेशानि श्रीविद्ये त्रिपुरेश्वरि ॥ २२ ॥
अशेषोत्पादयित्री त्वं स्थापयित्री निजात्मनि ।
विलापयित्री सर्वस्य परमेश्वरि ते नमः ॥ २३ ॥
अनूतना सर्वदाऽसि यतो नास्ति जनिस्तव ।
नवात्मिका सदा त्वं वै यतो नास्ति जरा तव ॥ २४ ॥
सर्वासि सर्वसारासि सर्वज्ञा सर्वहर्षिणी ।
असर्वाऽसर्वगाऽसाराऽसर्वज्ञाऽसर्वहर्षिणी ॥ २५ ॥
देवि भूयो नमस्तुभ्यं पुरस्तात् पृष्ठतोऽपि च ।
अधस्तादूर्ध्वतः पार्श्वे सर्वतस्ते नमो नमः ॥ २६ ॥
अपना अभीष्ट प्रकट करो। मेरे भक्तोंकी कोई भी इच्छा कभी विफल
नहीं होती” ॥ १६ उ०-२० ॥
यह परा वाणी सुनकर सभी मुनिश्रेष्ठोंने प्रणाम किया और
उनके ब्रह्मादिकने भी प्रणाम करके अनेकों स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति
की ॥ २१ ॥
फिर ऋषियोंने उन त्रिपुरेश्वरी विद्यादेवीसे कहा, “महेश्वरि !
श्रीविद्ये ! त्रिपुरेश्वरि ! आपको नमस्कार है ॥ २२ ॥
आप अपने ही में सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति स्थिति और लय
करनेवाली हैं। परमेश्वरि ! आपको नमस्कार है ॥ २३ ॥
आप सर्वदा पुरातन हैं, क्योंकि आपका जन्म नहीं होता और
सदा ही नवीना हैं, क्योंकि कभी आपकी वृद्धावस्था नहीं होती ॥ २४ ॥
आप सर्व हैं, सबकी सारभूता हैं, सर्वज्ञा हैं और सबको हर्षित
करनेवाली हैं। [किन्तु आपके स्वरूपमें सर्व तो है ही नहीं, इसलिये]
आप सर्वशून्या हैं, असर्वगता हैं, असारा हैं, असर्वज्ञा हैं और न
सर्वको हर्षित करनेवाली हैं ॥ २५ ॥
देवि ! आपको पुनः नमस्कार है। आपको आगेसे, पीछेसे, नीचेसे,
ऊपरसे, इधर-उधरसे और सभी ओरसे पुनः पुनः नमस्कार है ॥ २६ ॥