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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 322

३०८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
तेषां नो विविधा भाति स्थितिः प्रकृतिभेदतः ॥ ७ ॥
केचित् सदा समाधिस्थाः केचिन्मीमांसने रताः ।
अपरे भक्तिनिर्मग्नाश्चान्ये कर्मसमाश्रयाः ॥ ८ ॥
व्यवहारपरास्त्वेके बहिर्मुखनरा इव ।
तेषु श्रेयान् हि कतम एतन्नो वक्तुमर्हसि ॥ ९ ॥
स्वस्वपक्षं वयं विद्मः श्रेयांसमिति वै विधे ।
इति पृष्टोऽवदद् ब्रह्मा मत्वाऽनाश्वस्तमानसान् ॥ १० ॥
मुनीन्द्रा नाहमप्येतद्वेद्मि सर्वात्मना ततः ।
जानीयादिममर्थन्तु सर्वज्ञः परमेश्वरः ॥ ११ ॥
तत्र यामोऽर्थं संप्रष्टुमित्युक्त्वा तत्र तैरयौ ।
सङ्गम्य देवदेवेशं विष्णुं नाभिसमागतः ॥ १२ ॥
पप्रच्छ ऋषिमुख्यानां प्रश्नं तं लोकसृड् विधिः ।
कारण सभी तत्त्वोंके जाननेवाले हैं । किन्तु स्वभावभेदसे हम सबकी
स्थितियाँ तरह-तरहकी हैं ॥ ७ ॥
हममें से कोई सर्वदा समाधिमें मग्न रहते हैं, कोई विचारमें लगे
रहते हैं, कोई भक्तिभावमें लीन रहते हैं और कोई कर्ममें निष्ठा रखने
वाले हैं ॥ ८ ॥
कोई बहिर्मुख पुरुषोंकी तरह व्यवहारमें लगे रहते हैं । इन
सबमें श्रेष्ठ कौन हैं—यह हमें बतलानेकी कृपा करें । ब्रह्मन् ! हम
लोग तो अपने-अपने पक्षको ही सबसे श्रेष्ठ मानते हैं ॥ ९--१० पू० ॥
मुनियों द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर ब्रह्माजीने यह सोचकर कि
इनके चित्तमें मेरे प्रति ठीक-ठीक श्रद्धा नहीं है, उनसे, कहा, “मुनीन्द्रो !
यह बात पूरी तरहसे मैं भी नहीं जानता । भगवान् महेश्वर सर्वज्ञ हैं,
वे इस विषयमें जानते होंगे ! १० उ०--११ ॥
चलो, उनसे पूछनेके लिये वहाँ चलें ।” ऐसा कहकर वे उन
सबको लेकर वहाँ गये । भगवान् विष्णु भी वहीं पधारे हुए थे ।
अतः उनके सहित श्रीमहादेवजीसे मिलकर लोकस्रष्टा श्रीब्रह्माजीने
मुनिश्रेष्ठोंका प्रश्न पूछा ॥ १२--१३ पू० ॥