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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 315

एकोनविंशोऽध्यायः । ३०१
यस्यापराधरूपापि कर्मरूपापि वासना ॥ ८८ ॥
स्वल्पा कामात्मकाश्चापि बहुलास्तस्य भार्गव ।
बहुलश्रवणैस्तद्वन्मननैश्च समाधिभिः ॥ ८९ ॥
चिरकालेन विज्ञानं बहुक्लेशेन जायते ।
तस्य व्यवहृतिः स्वल्पा तत्राभ्यासप्रकर्षतः ॥ ९० ॥
मनो यदि भवेन्नष्टप्रायं निर्वासनं ततः ।
ज्ञानिनस्त्वीदृशाः प्रोक्ता मध्यमा नष्टमानसाः ॥ ९१ ॥
तेषामेव तु केषाश्चिदभ्यासस्याप्रकर्षतः ।
वासनाविरलं यस्मादनष्टं मानसं भवेत् ॥ ९२ ॥
समनस्कास्तु ते प्रोक्ता मन्दज्ञानयुतास्तु वै ।
केवलज्ञानिनस्त्वेते जीवन्मुक्तास्तथेतरे ॥ ९३ ॥
केवलज्ञानिनो दृष्टदुःखाभाजो भवन्ति हि ।
प्रारब्धतन्त्रास्ते प्रोक्ता देहान्ते मुक्तिभागिनः ॥ ९४ ॥
ये नष्टमानसाः प्रोक्तास्तैः प्रारब्धं पराकृतम् ।
जिसमें अपराध और कर्मरूप वासनाएँ कम हैं किन्तु कामत्रासना
अधिक है, परशुराम ! उसे बहुत श्रवण, मनन और समाधिका अभ्यास
करनेपर चिरकालमें बड़ी कठिनतासे ज्ञान होता है ॥८८ उ०-६० पू०॥
उसका व्यवहार बहुत कम रहता है। अभ्यासकी अधिकता-
से जब उसका मन नष्टप्राय हो जाता है, तो वह वासनाशून्य हो
जाता है। ऐसे ज्ञानी मध्यम कोटिके होते हैं और 'नष्टमानस'
कहलाते हैं ॥ ६० उ०-६१ ॥
उनमेंसे ही किन्हीं-किन्हींमें अभ्यासकी अधिकता न होनेके कारण
कुछ वासनाएँ रह जाती हैं, क्योंकि उनका मन नष्ट नहीं होता ॥६२॥
वे 'समनस्क' कहे जाते हैं और मन्द ज्ञानवान् होते हैं। ये
केवल ज्ञानी हैं, अन्य ( उत्तम और मध्यम कोटिके ) ज्ञानी जीवन्मुक्त
होते हैं ॥ ६३ ॥
केवल ज्ञानियोंको दृष्ट दुःख भोगने पड़ते हैं। वे प्रारब्धके अधीन
रहते हैं और उन्हें देह त्याग करनेपर मुक्ति मिलती है ॥ ६४ ॥
जो नष्टमनस ज्ञानी कहे गये हैं उन्होंने तो प्रारब्धको परास्त