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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 312

२६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
तस्माद् बुद्धौ वासनाभिस्त्वावृत्तेस्तारतम्यतः ॥ ६९ ॥
ज्ञानं भिन्नं लक्ष्यते हि स्थितिभेदस्तथा भवेत् ।
राम पश्य स्थितेर्भेदं ज्ञानिनां तु परस्परम् ॥ ७० ॥
ब्रह्मविष्णुमहेशानां स्वभावज्ञानिनस्तु ते ।
तेषां पश्य स्थितेर्भेदं स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ७१ ॥
नैषां ज्ञानस्य मालिन्यं वक्तुं शक्यं कथञ्चन ।
स्वभावगुणमाहात्म्यं भिन्नमेव तथापि हि ॥ ७२ ॥
यथा ज्ञानिशरीरं तु गौरं न श्यामतां व्रजेत् ।
एवं चित्तस्वभावोऽपि नान्यभावं प्रपद्यते ॥ ७३ ॥
अस्मान् राम तथा पश्य ज्ञानिनोऽत्रिसुतान् स्थितान् ।
दुर्वाससं चन्द्रमसं माञ्च भिन्नस्थितिं गतम् ॥ ७४ ॥
क्रोधिनं कामिनं त्यक्तसर्वलिङ्गपरिग्रहम् ।
होता है। अतः वासनाओंके कारण बुद्धिमें आवरणकी न्यूनाधिकता
रहनेके कारण भिन्न-भिन्न कोटिका ज्ञान देखा जाता है और इसीसे
स्थितिमें भी भेद रहता है ॥ ६९-७० पू० ॥
परशुराम ! तुम ज्ञानियोंकी पारस्परिक स्थितियोंका भेद तो
देखो—ब्रह्मा, विष्णु और महादेव ये तीनों स्वभावसे ही ज्ञानी हैं;
किन्तु देखो, अपने स्वभावसिद्ध गुणोंके कारण उनकी स्थितियोंमें
कितना भेद है ॥ ७० उ०-७१ ॥
इनके ज्ञानमें किसी भी प्रकार मलिनता तो बतायी नहीं
जा सकती। तथापि स्वाभाविक गुणोंका प्रभाव तो अलग ही
होता है ॥ ७२ ॥
जिस प्रकार किसी ज्ञानीका गोरा शरीर साँवला नहीं हो सकता
इसी प्रकार उसके चित्तका स्वभाव भी नहीं बदल सकता ॥ ७३ ॥
परशुराम ! तुम हम ही को देखो। महर्षि अत्रिके हम तीनों
पुत्र ज्ञानी हैं। किन्तु दुर्वासा, चन्द्रमा और मेरी स्थितियोंमें बड़ा
अन्तर है ॥ ७४ ॥
दुर्वासा क्रोधी है, चन्द्रमा कामी है और मैं सब प्रकारके लिंग