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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 305

एकोनविंशोऽध्यायः । २६१
रामाम्भोधौ तरङ्गाणां संख्यां कुर्याद्धि कश्चन ।
पार्थिवानाम्णूनां वा तथा तारागणस्य वा ॥ २५ ॥
एकस्यापि हि कामानां संख्यातुं नैव शक्यते ।
इयं राम तृतीया ते संप्रोक्ता कामवासना ॥ २६ ॥
आकाशादपि विस्तीर्णा ह्यचला भूधरादपि ।
आशापिशाची प्रोक्तेयं राम या कामवासना ॥ २७ ॥
अनयैव हि सर्वोऽयं लोक उन्मत्तवत् स्थितः ।
येन दन्दह्यमानोऽयं लोक आक्रन्दते तदा ॥ २८ ॥
केऽपि लोके धन्यतमा महामन्त्रसमाश्रयात् ।
विनिर्मुक्तास्तया भान्ति नराः सर्वाङ्गशीतलाः ॥ २९ ॥
एताभिस्तिसृभी राम वासनाभिर्यतो मनः ।
समाक्रान्तमतो नूनं तत्तत्त्वं नावभासते ॥ ३० ॥
अतः सर्वसाधनस्य वासनानाशनं फलम् ।
परशुराम ! कोई पुरुष समुद्रकी तरंगोंकी गणना तो कर सकता है,
पृथ्वीके कणोंको भी गिन सकता है और तारागणकी गिनती भी कर
सकता है; किन्तु किसी एक पुरुषकी भी कामनाओंको गिनना सम्भव
नहीं है । परशुराम ! यह तुमसे तीसरी कामवासनाका वर्णन
किया ॥ २४ उ०--२६ ॥
परशुराम ! यह कामवासना ही आशापिशाची भी कही जाती है ।
यह आकाशसे भी विस्तीर्ण और पर्वतसे भी अधिक अविचल है ॥२७॥
इसीके कारण यह सारा लोक उन्मत्त-सा हो रहा है और इसीसे
दग्ध होकर यह सर्वदा चीत्कार करता रहता है ॥ २८ ॥
इस संसारमें कोई अत्यन्त बड़भागी पुरुष ही परवैराग्यरूप
महामन्त्रका आश्रय लेकर इससे मुक्त होते हैं और फिर सर्वाङ्ग शीतल
होकर सुशोभित होते हैं ॥ २९ ॥
परशुराम ! क्योंकि मन इन तीन वासनाओंसे आक्रान्त है, इसीसे
इसे वह परमतत्त्व प्रकाशित नहीं होता ॥ ३० ॥
अतः सब साधनोंका फल वासनाओंका नाश ही है। इनमें