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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 404 में से

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पृष्ठ 285

अष्टादशोऽध्यायः। २७१
चिदात्मा केवलः स्वच्छः स्वाच्छन्द्यान्मन आदिकम्।
परिकल्प्य व्यवहरेत् दृश्यद्रष्ट्रादिभेदतः ॥ ७० ॥
क्वचित् क्वचित् केवलं तु निर्विकल्पात्मना स्थितः ।
शृणु भार्गव चित्तत्त्वं परिपूर्णमपि स्वयम् ॥ ७१ ॥
नाकाशतुल्यं चैतन्यात् स्वप्रकाशमतः स्थितम्।
आकाशश्च चिदात्मा च न विलक्षणतां गतौ ॥ ७२ ॥
पूर्णः सूक्ष्मो निर्मलश्चाजोऽनन्तोऽपि निराकृतिः ।
सर्वाधारोऽप्यसङ्गात्मा सर्वान्तरबहिर्भवः ॥ ७३ ॥
विशेषस्तत्र चैतन्यमाकाशे तन्न विद्यते ।
वस्तुतश्चैतन्यपूर्ण आत्मैवाकाश उच्यते ॥ ७४ ॥
नह्यात्माकाशयोर्भेदो लेशतोऽपि हि विद्यते ।
य आकाशः स आत्मैव यथात्माऽऽकाश एव सः॥ ७५ ॥
अज्ञाः पश्यन्त्यात्मरूपमाकाशमिति वै भ्रमात् ।
केवल शुद्ध चिदात्मा ही अपने स्वातन्त्र्यसे मन आदिकी कल्पना
करके कभी तो द्रष्टा और दृश्य आदि भेदरूपसे व्यवहार करता है
और कभी केवल निर्विकल्प रूपसे स्थित रहता है ॥ ७०-७१ पू० ॥
भृगुनन्दन ! सुनो, चित्तत्त्व स्वयं परिपूर्ण होनेके कारण आकाश
के समान नहीं है। इसीसे वह स्वयंप्रकाश भी है। [आकाशकी तरह
जड़ नहीं है।] इसके सिवा आकाश और चिदात्मामें कोई और भेद
नहीं है ॥ ७१ उ०-७२ ॥
आकाशकी तरह चिदात्मा भी परिपूर्ण, सूक्ष्म, निर्मल, अजन्मा,
अनन्त, निराकार, सबका आधार, असङ्ग और सबके भीतर-बाहर
रहनेवाला है। उसमें विशेषता केवल चैतन्यकी ही है, आकाशमें यह
गुण नहीं है। वास्तवमें तो चैतन्यसे पूर्ण आकाश ही 'आत्मा' कहा
जाता है ॥ ७३-७४ ॥
आकाश और आत्माका और कोई लेशमात्र भी अन्तर नहीं
है। जो आकाश है वही आत्मा है और जो आत्मा है वही आकाश
है ॥ ७५ ॥
अज्ञानी लोग भ्रमवश आत्माके स्वरूपको ही आकाशरूपमें देखते हैं;