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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 279

अष्टादशोऽध्यायः। २६५
यो बहिः स कथं सिद्धयेच्चितिसम्बन्धवर्जितः ॥ ३४ ॥
सम्बन्धोऽपि नैकदेशः स्यादसिद्धस्तथेतरः ।
तत्सम्बन्धांशमात्रस्य भानादन्यन्न सिद्ध्यति ॥ ३५ ॥
अतो बहिः पदार्थोऽपि चितिनिर्मग्न इष्यताम् ।
एवं च सर्वात्मनैव मग्नं चेत्यमपीष्यताम् ॥ ३६ ॥
कथं स्वान्तर्विनिर्मग्नं स्वपरिच्छेदकं भवेत् ।
चेत्यमेवंविधं राम विचारय सुयुक्तिः ॥ ३७ ॥
चितेरन्तर्भासमानं प्रतिबिम्बात्मकं भवेत् ।
न भावोदरगोऽभावो भवन् लोके सुदृश्यते ॥ ३८ ॥
भावानां स्याद्धि साङ्कर्यं तथा चेद्राम सर्वतः ।
बहिः पदार्थस्ते प्रोक्तो भ्रममूलो हि सर्वथा ॥ ३९ ॥
तदाश्रयाणां भावानां कथं स्यात् सत्यता वद ।
चितिस्वरूपः स्वात्मैव तत्तद्भावात्मना सदा ॥ ४० ॥
हो सकती; क्योंकि चेतनसे सम्बन्ध न रखकर जो पदार्थ उससे बाहर
होगा उसकी सिद्धि कैसे होगी ? ॥ ३४ ॥
वह चेत्य और चेतनका सम्बन्ध भी एक देशमें नहीं माना जा
सकता । यदि ऐसा माना जाय तो चेत्यके अन्य अंशकी सिद्धि नहीं हो
सकती । उस सम्बन्धित अंशमात्रका भान होनेसे ही अन्य अंश तो
सिद्ध नहीं हो जाता ॥ ३५ ॥
अतः बाह्य पदार्थोंको भी चेतनमें डूबे हुए समझो । इस प्रकार
चेत्यवर्गको भी सर्वथा चेतनके गर्भमें ही अनुभव करो ॥ ३६ ॥
जो चेत्य अपनेमें ही निमग्न है वह अपना ही परिच्छेदक कैसे
हो सकता है ? हे परशुराम ! इस प्रकार युक्तिपूर्वक विचार करो ॥३७॥
जो वस्तु चेतनके भीतर भासती है वह प्रतिबिम्बरूप ही हो सकती
है, क्योंकि लोकमें किसी एक पदार्थके भीतर रहनेवाला दूसरा पदार्थ
देखा नहीं जाता ॥ ३८ ॥
परशुराम ! यदि ऐसा माना जायगा तब तो सर्वत्र पदार्थोंका
घोटाला हो जायगा । यह बात पहले कही ही जा चुकी है कि बाह्य
पदार्थ सर्वथा भ्रममूलक हैं । तो बताओ, उस बाह्याभासके आश्रित
रहनेवाली वस्तुओंकी सत्यता कैसे सिद्ध हो सकती है ? ॥३६-४० पू०॥