त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः। १६१
शृणु राम जगद्-भ्रान्तेर्मूलमेतत् सनातनम्।
वस्त्वविद्यापूर्वकं यद्दृढा भावनमेव तत् ॥ ६ ॥
पश्यात्मानमविज्ञाय स्वात्मबुद्धिं शरीरके।
क्व मांसरुधिरास्थीनि क्व चिदात्माऽतिनिर्मलः ॥ ७ ॥
केवलं भावनादार्ढ्याच्चिदात्मा देहकोऽभवत्।
ज्ञातेऽप्यात्मनि चिद्रूपे भूयो भ्रान्तिः शरीरके ॥ ८ ॥
एवमेव भावनया सत्यं भाति जगत् खलु।
विपरीतं भावयन् वै दृढं भ्रान्ति निवर्त्तयेत् ॥ ९ ॥
यो यथा भावयेदेतज्जगतस्य तथा भवेत्।
योगिनां धारणाध्यानैः पश्य तद्रूपसङ्गतिम् ॥ १० ॥
अत्र ते वर्त्तयिष्यामि पुनरावृत्तमद्भुतम्।
अस्ति वङ्गे सुन्दराख्यं पुरं परमपावनम् ॥ ११ ॥
परशुराम ! सुनो, इस जगत्-भ्रान्तिका अनादि मूल कारण यह है
कि जो वस्तु अज्ञानसे भास रही है उसे हृदयसे दृढतापूर्वक पकड़
रखा है ॥ ६ ॥
देखो, आत्माको न जाननेके कारण ही तो शरीरमें आत्मबुद्धि हुई
है। अन्यथा कहाँ ये मांस, रक्त और हड्डियाँ तथा कहाँ अत्यन्त निर्मल
चेतन आत्मा ! ॥ ७ ॥
केवल भावनाकी दृढताके कारण ही यह शरीर चिदात्मा बन बैठा
है। यहाँतक कि चिद्रूप आत्माको जान लेनेपर भी पुनः शरीरमें
ही आत्मत्वकी भ्रान्ति हो जाती है ॥ ८ ॥
ठीक इसी प्रकार भावनाकी दृढताके कारण ही संसार सत्य जान
पड़ता है। अतः इसके विपरीत भावना करके इस दृढ भ्रान्तिको
निवृत्त करना चाहिये ॥ ९ ॥
जो जैसी भावना करता है उसके लिये यह, जगत् वैसा ही हो
जाता है। देखो, योगियोंको धारणा-ध्यानादिके द्वारा तद्रूप अनुभव होने
लगता है ॥ १० ॥
इस विषयमें मैं एक अद्भुत प्राचीन प्रसंगकी तुमसे चर्चा करता
हूँ। वंगदेशमें सुन्दरपुर नामक एक बड़ा ही पवित्र नगर है ॥ ११ ॥