त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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एकादशोऽध्यायः । १५६
तथैवास्य स्वभावोऽपि विचारे न स्थिरीभवेत् ।
अत आश्रयरूपेण विना नास्ति हि किञ्चन ॥ ८४ ॥
यदस्तीति भाति तत्तु चितिरेव महेश्वरी ।
एवं जगच्चिदेकात्मरूपं ते सम्यगीरितम् ॥ ८५ ॥
इति श्री० ज्ञानखण्डे जगत्तत्त्वनिरूपणे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
प्रकार विचार करने पर इस संसारका स्वभाव भी स्थिर नहीं जान
पड़ता । अतः अपने आश्रय चेतनके सिवा यह और कुछ नहीं है
॥ ८३ उ०-८४ ॥
जो 'है' इस रूपसे भास रहा है वह तो केवल महेश्वरी चिति ही
है। इस प्रकार जगत् और चेतनकी एकरूपताका यथावत् विवेचन
हुआ ॥ ८५ ॥
एकादश अध्याय समाप्त ।