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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

दशमोऽध्यायः । १३६
अश्वमेधराजसूयाद्यैर्यजन्क्रतुमुरुयकैः ।
वर्षाणामयुते द्वे वै जीवन्मुक्तो भुवि स्थितः ॥ ४२ ॥
जीवन्मुक्तदशासंस्थं निशाम्य तनयं नृपः ।
मुक्ताचूडश्च तद्‌भ्राता मणिचूडोऽप्यचिन्तयत् ॥ ४३ ॥
किमयं पूर्ववन्नेह लक्ष्यते सर्वथा किल ।
सुखे न हृष्यत्यत्यन्तं दुःखे नोद्विजते तथा ॥ ४४ ॥
लाभालाभौ शत्रुमित्रे साम्यात्पश्यति वै कुतः ।
करोति राजकार्याणि नटवद्रङ्गमण्डले ॥ ४५ ॥
कापिशायनपायीव सदा मत्तोऽभिलक्ष्यते ।
सदान्यत्र गतस्वान्त इव कृत्यङ्करोत्यलम् ॥ ४६ ॥
तत्केन हेतुना चेति तमासाद्य रहः क्वचित् ।
अपृच्छतां हेमचूडं कुत एवं भवानिति ॥ ४७ ॥
अश्वमेध और राजसूय आदि बड़े-बड़े यज्ञ करते हुए बीस हजार वर्षतक
जीवन्मुक्त अवस्थामें इस पृथ्वीतलपर रहा ॥ ४०-४२ ॥
अपने पुत्रको जीवन्मुक्त अवस्थामें स्थित देखकर राजा मुक्ताचूड़ने
और उसके भाई मणिचूड़ने भी विचार किया — ॥ ४३ ॥
‘क्या कारण है अब यह हेमचूड़ पहलेकी तरह बिलकुल दिखायी
नहीं देता । यह न तो सुखमें विशेष प्रसन्न होता है और न दुःखमें
उदास होता है ॥ ४४ ॥
यह लाभ-हानि और शत्रु-मित्रोंको समान दृष्टिसे क्यों देखने
लगा है । आजकल यह राज्यके सब कार्य रंगभूमिमें नाटकके पात्रके
समान कर रहा है ॥ ४५ ॥
यह मद्यपायीके समान सर्वदा अपनेमें मस्त दिखायी देता है
और सारे कार्य सदा इस प्रकार करता है मानो इसका चित्त कहीं
अन्यत्र ही लगा हो ॥ ४६ ॥
यह सब किस कारणसे हुआ ?’ ऐसा सोचकर किसी दिन
उन्होंने एकान्तमें हेमचूड़के पास जाकर पूछा, “तुम्हारी यह दशा कैसे
हो गयी” ॥ ४७ ॥