त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः । १२५
नाथ सूक्ष्मदृशा पश्य ज्ञानज्ञेयात्मकं जगत् ।; ८६ ॥
तत्र ज्ञानं स्वतःसिद्धं तदभावे न किञ्चन ।
प्रमाणानां प्रमाणं तदप्रमाणं स्वतो भवेत् ॥ ८७ ॥
यतः प्रमाणानपेक्षमादिसिद्धमतस्तु तत् ।
सिद्धसाधकभावेन न तत्सिद्धिः कदाचन ॥ ८८ ॥
तत्र विप्रतिपन्नस्य न प्रश्नो नापि चोत्तरम् ।
अनपह्नवनीयं तन्महादर्शतलं भवेत् ॥ ८९ ॥
तत्र सर्वं भासते वै दर्पणप्रतिबिम्बवत् ।
देशेन वापि कालेन परिच्छित्तिर्न विद्यते ॥ ९० ॥
तदन्तर्भासमानत्वात् कथं ताभ्यां परिच्छिदिः ।
परिच्छेदस्य भानन्तु गगने वस्तुभिर्यथा ॥ ९१ ॥
नाथ ! इस ज्ञान और ज्ञेयस्वरूप जगत्को आप सूक्ष्मदृष्टिसे देखिये ।
इसमें जो ज्ञान ( अनुभव ) है वह स्वतः सिद्ध है; वह न हो तो कुछ
भी नहीं रह सकता ॥ ८६ उ०-८७ पू० ॥
वह सम्पूर्ण प्रमाणोंका प्रमाण है, किन्तु स्वयं किसी प्रमाणका
विषय नहीं है। क्योंकि अपनी सिद्धिके लिये उसे प्रमाणकी अपेक्षा
नहीं है, इसलिये वह सबसे पहले सिद्ध ( विद्यमान ) है। वह
किसी सिद्धिका साधक है—इस रूपसे भी उसकी कभी सिद्धि नहीं
हो सकती¹ ॥ ८७ उ०-८८ ॥
जिसे उस ज्ञानकी सत्तामें सन्देह है उसका तो कोई प्रश्न
भी नहीं हो सकता और न उसे उत्तर ही दिया जा सकता है। एक
महान् दर्पणके समान उसका किसी भी प्रकार निषेध नहीं किया जा
सकता ॥ ८९ ॥
दर्पणमें प्रतिबिम्बकी तरह उसीमें सब कुछ भास रहा है।
किसी भी देश या कालसे उसका परिच्छेद नहीं हो सकता ॥ ९० ॥
क्योंकि ये ( देश और काल ) भी तो उसीमें भास रहे हैं, फिर
इनसे उसका परिच्छेद कैसे हो सकता है। इनके द्वारा उसके
१. क्योंकि न तो उससे भिन्न किसीकी सत्ता है, जिसकी वह सिद्धि करे। और
न वह किसीका कर्ता या करण ही है, जो किसीकी सिद्धिका साधक या साधन बने।