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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 132

११८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे
आसने मृदूतूलाढ्ये विवेशान्यत्रिवर्जितः ।
मनः समाधाय दृढं विचारमकरोत्तदा ॥ २२ ॥
नूनमेते जनाः सर्वे कथमेवं विमोहिताः ।
न कोऽप्यत्र विजानाति स्वात्मानं लेशतोऽपि च ॥ २३ ॥
सर्वोऽपि स्वात्मनो हेतोः करोति विविधाः क्रियाः ।
केचित् पठन्ति शास्त्राणि साम्नायानि च नित्यशः ॥ २४ ॥
केचिद्धनान्यर्जयन्ति केचिच्छासति चावनिम् ।
अन्ये युध्यन्ति रिपुभिरन्ये भोगैकलम्पटाः ॥ २५ ॥
कुर्वन्त्येतत् स्वार्थमेते स्वस्वात्मा कतमो भवेत् ।
नैनं जानाति कोऽप्यत्र कुत एवमयं भ्रमः ॥ २६ ॥
अहो यथावदात्मानमविदित्वाैव वै कृतम् ।
व्यर्थं स्वप्ने कृतमिव तदद्य विमृशामि तम् ॥ २७ ॥
कोमल रुईसे भरे गद्दे पर बैठ गया और मनको अच्छी तरह एकाग्रकर
विचार करने लगा । उस समय वहाँ और कोई नहीं था ॥ २१-२२ ॥
'सचमुच ये सब लोग ऐसा क्यों मोहमें पड़े हैं ? यहाँ कोई अपने
आत्मस्वरूपको लेशमात्र भी तो नहीं जानता ! ॥ २३ ॥
सब लोग अपने सुखके लिये ही तरह-तरहके कर्म कर रहे हैं ।
कोई नित्यप्रति शास्त्राध्ययन करते हैं और कोई वेदपाठमें लगे हुए
हैं ॥ २४ ॥
कोई धनोपार्जन करते हैं, कोई पृथ्वीका शासन कर रहे हैं,
कोई शत्रुओंके साथ युद्ध करनेमें संलग्न हैं और कोई भोग भोगनेमें
मस्त हैं ॥ २५ ॥
ये सब कार्य अपने ही लिये समझकर किये जाते हैं, किन्तु यह
कोई नहीं जानता कि अपना आत्मा कौन है । ऐसा भ्रम कैसे हो
गया ॥ २६ ॥
अहो ! इस आत्मतत्त्वको यथावत् बिना जाने तो ये सभी कर्म
स्वप्नमें किये कर्मोंके समान व्यर्थ ही हैं। इसलिये अब मैं उस आत्मा-
का ही विचार करता हूँ ॥ २७ ॥