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सर्वकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 121

सप्तमोऽध्यायः । १०७
अपरे तु स्वरूपे हि कल्पितं मुख्यतादि हि ।
तस्मात् प्राज्ञ उपासीत परं रूपं हि निष्कलम् ॥ ९३ ॥
असमर्थः स्थूलरूपं यद्बुद्धौ सङ्गतं दृढम् ।
तदुपास्या हेतुतस्तु श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ९४ ॥
नान्यथास्य गतिः क्वापि भवेद्वै कोटिजन्मभिः ॥ ९५ ॥
इति श्रीमज्ज्ञानखण्डे हेमचूड़ोपाख्याने ईश्वरस्वरूप-
निरूपणं सप्तमोऽध्यायः ।
[ यदि कहो कि शास्त्रोंमें इनकी मुख्यता-गौणता क्यों बतायी गयी
है, तो उसका उत्तर यह है, कि ] ये मुख्यता आदि [ भक्तों की भावना-
के अनुसार ] भगवान्‌के इस अपररूपमें ही कल्पित हैं। इसलिये
विवेकी पुरुषको तो उनके कलातीत परस्वरूप की ही उपासना करनी
चाहिये ॥ ६३ ॥
जो इस प्रकार उपासना करनेमें समर्थ न हो वह उस स्थूल
रूपकी निष्काम उपासना करे जो उसकी बुद्धिमें दृढ़तासे जमता हो ।
इससे भी वह परम निःश्रेयसको प्राप्त कर सकता है। इसके सिवा
तो करोड़ों जन्मोंमें भी इसके लिये कोई अन्य मार्ग नहीं हो
सकता ॥ ६४-६५ ॥
सप्तम अध्याय समाप्त ।