त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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तस्मान्महामायिनं तमप्रसाद्य कथं भवेत् ।
महामोहस्य तरणं तस्मात्तं सर्वथाश्रयेत् ॥ ३० ॥
यस्तं प्रसादयेत् सम्यक् प्राप्य तस्य प्रसादतः ।
महाविद्यां स तन्मोहाद् ध्रुवमुत्क्रान्तिमेष्यति ॥ ३१ ॥
अन्येऽपि योगाः कथिताः श्रेयःसाधनकर्मणि ।
महेश्वरप्रसादात्ते विना न स्युः फलाप्तये ॥ ३२ ॥
तस्मादाराधयेदादौ महेशं विश्वकारणम् ।
भक्त्या स साधयेदाशु योगान्मोहविनाशनान् ॥ ३३ ॥
एतज्जगत् कार्यभूतं प्रत्यक्षं परिदृश्यते ।
सांशमेवं पृथिव्याद्यमदृष्टारम्भमप्यलम् ॥ ३४ ॥
कार्यं स्यादिति तर्केण बह्वागमदृढेन तु ।
व्यवस्येत्तत्र कर्त्तारं सर्वकर्तृविलक्षणम् ॥ ३५ ॥
अतः उन महामायी महेश्वरको बिना प्रसन्न किये इस महामोहसे
कोई कैसे पार पा सकता है। इसलिये सब प्रकार उनका ही आश्रय
लेना चाहिये ॥ ३० ॥
जो उन्हें अच्छी तरह प्रसन्न कर लेता है वह उनकी कृपासे महा-
विद्या ( अद्वितीय शिवात्मज्ञान ) को प्राप्त कर निश्चय ही उस मोहको
पार कर लेता है ॥ ३१ ॥
श्रेयःसाधनके लिये प्राणायामादि और भी कई प्रकारके योग
शास्त्रोंमें बतलाये गये हैं, परन्तु श्रीमहेश्वरकी कृपाके बिना वे फलकी
प्राप्ति करानेवाले नहीं होते ॥ ३२ ॥
इसलिये सबसे पहले विश्वके आदि कारण श्रीमहेश्वरकी भक्ति-
पूर्वक आराधना करनी चाहिये । वे शीघ्र ही मोहकी निवृत्ति करनेवाले
योगोंको सफल कर देते हैं ॥ ३३ ॥
यह सारा जगत् प्रत्यक्ष ही किसीका कार्य जान पड़ता है । यद्यपि
किसीने इसकी उत्पत्ति देखी नहीं है, तथापि सावयव होनेके कारण
पृथ्वी आदि हैं ऐसे ( उत्पन्न होनेवाले ) ही ॥ ३४ ॥
इसप्रकार अनेकों शास्त्रवाक्योंसे परिपुष्ट तर्कके द्वारा ये कार्य
ही हैं—ऐसा निश्चय करे । तथा इसका कर्त्ता अन्य सब कर्त्ताओंसे
विलक्षण है ॥ ३५ ॥